Lovedeep Kapila

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Responsibility

Dec 162017

उत्तरदायित्व सदैव ही स्वतंत्रता का सबसे पहला कदम है। किसी दूसरे के कंधों पर उत्तरदायित्व डाल देना, स्वतंत्रता के अवसर को चूक जाना है। गंवा देना है। उत्तरदायित्व और स्वतंत्रता को अलग-अलग नहीं किया जा सकता। वे अविभाज्य रूप से एक हैं।

यह सच है कि संपूर्ण उत्तरदायित्व शिष्य का ही है। गुरु तो केवल एक उत्प्रेरक या एक बहाना ही है। परंतु उत्तरदायित्व को स्वीकार करना हिम्मत का काम है। स्वतंत्रता तो हर कोई चाहता है, पर उत्तरदायित्व कोई भी नहीं लेना चाहता। लेकिन समस्या यह है कि स्वतंत्रता और उत्तरदायित्व साथ-साथ रहते हैं। यदि तुम उत्तरदायित्व नहीं चाहते, तो किसी न किसी रूप में गुलाम जरूर बना लिए जाओगे।

यह गुलामी आध्यात्मिक भी हो सकती है, जो संभवत: सबसे बुरी गुलामी है। राजनैतिक, आर्थिक गुलामी तो ऊपरी हैं, बनावटी हैं। तुम उनके खिलाफ आसानी से विद्रोह कर सकते हो। लेकिन आध्यात्मिक गुलामी इतनी गहरी है कि उसके खिलाफ विद्रोह करने का खयाल ही नहीं आता। सीधा-सा कारण यह है कि यह गुलामी है ही इसलिए, क्योंकि तुमने इसे स्वयं चाहा है।

स्वयं मांगा है। दूसरी गुलामियां तुम्हारे ऊपर लादी जाती हैं। उन्हें तुम उतारकर फेंक सकते हो, लेकिन आध्यात्मिक गुलामी तुम्हें इच्छा के विपरीत नहीं लगती। यह एक बड़ी सांत्वना मालूम पड़ती है। यह सांत्वना कि तुम्हारे उत्तरदायित्व किसी ऐसे व्यक्ति ने अपने ऊपर ले लिया है, जो जानता है कि अब तुम्हें चिंता करने की आवश्यकता नहीं है। लेकिन स्मरण रहे, उत्तरदायित्व के साथ-साथ तुमने स्वतंत्रता भी गंवा दी, क्योंकि तुमने उससे अपेक्षा कर ली।undefined

अपेक्षा एक बंधन है। देर-सबेर यह निराशा में ले जाती है। गुरु-शिष्य का संबंध आशा-अपेक्षाओं का संबंध नहीं है। लेकिन तुम्हारा जीवन अपेक्षाओं से भरा हुआ है। इसीलिए जब तुम गुरु के पास भी आते हो, तब भी तुम्हारा मन अपेक्षाएं लगा लेता है। यदि कोई गुरु तुम्हारी अपेक्षाएं पूरी करने को तैयार है, तो वह गुरु नहीं है। वह केवल तुम्हारा शोषण कर रहा है।

कोई सद्गुरु यह नहीं कहता कि मैं तुम्हारी अपेक्षाएं पूरी करूंगा। वह केवल इतना ही कह सकता है कि मैं तुम्हारी सभी अपेक्षाएं नष्ट कर दूंगा, क्योंकि इसके बिना तुम्हारा पुराना, सड़ा-गला मन नष्ट नहीं किया जा सकता। तुम्हारी पुरानी आदतें तुम्हारी चेतना अस्तित्व के विकास में बाधक हैं, दूर नहीं की जा सकतीं।

प्रामाणिक गुरु अपने ऊपर उत्तरदायित्व नहीं लेता। सच तो यह है कि सिर्फ मिथ्या गुरु ज्यादा ही अवतार या पैगंबर, एक रक्षक, एक मसीहा, एक संदेशवाहक होने के खयाल का मजा ले सकता है। केवल वही है, जो तुम्हारी कमजोरियों का लाभ उठा रहा है। वह तुमसे कह सकता है कि बस मुझ पर विश्वास करो और तुम बचा लिए जाओगे। तुम्हें यह बड़ा सस्ता और सरल लगता है।

मनुष्यता की शुरुआत से ही ऐसे लोग रहे हैं, जो आदमी की कमजोरियों का फायदा उठाते रहे हैं। आदमी की सबसे बड़ी कमजोरियों में एक यह है कि वह मुफ्त में ही सब कुछ पाना चाहता है। यदि ईश्वर के अस्तित्व का विश्वास करने से ही स्वर्ग मिल जाए और यदि रक्षक सच में हो बचाने वाला, तब तुम खो कुछ नहीं रहे हो, सिर्फ पा रहे हो। तुम्हें भले ही न मिले, लेकिन मिलने की आशा में तो रहोगे। धार्मिक लोग तो तुम्हें आशा देते रहे हैं।

कार्ल मा‌र्क्स कहा करते थे कि धर्म भीड़ के लिए अफीम का नशा है, पर वह इस तथ्य के गहन विश्लेषण में कभी नहीं गए। क्या है अफीम? आशा अफीम है। वे तुम्हें आशा देते हैं। वे तुम्हें कुछ नहीं के बदले सब कुछ देने को तैयार हैं। बस विश्वास करो, सारा उत्तरदायित्व उन्हें सौंप दो। और तुम इस बात के लिए सजग नहीं हो कि जिस क्षण तुमने अपना उत्तरदायित्व उन्हें सौंपा, तुमने अपनी स्वतंत्रता भी उन्हें दे दी।

उनकी रुचि, उनकी उत्सुकता केवल तुम्हारी स्वतंत्रता में है। स्वतंत्रता की बात वे तुमसे नहीं करते। वे तुमसे यह नहीं कहते, अपनी स्वतंत्रता हमें दे दो, क्योंकि कोई अपनी स्वतंत्रता उन्हें नहीं देगा। वे कहते हैं, अपना उत्तरदायित्व हमें दे दो, क्योंकि लोगों को अपना उत्तरदायित्व बोझ मालूम पड़ता है। लेकिन इस तथ्य के प्रति तुम जागरूक नहीं हो कि उत्तरदायित्व के साथ-साथ ही तुम्हारी स्वतंत्रता भी खो जाती है। तुम एक गुलाम बन जाते हो।

संपूर्ण मनुष्य-जाति अलग-अलग तरह के लोगों द्वारा गुलाम बना ली गई है, पर गुलामी एक ही है। एक प्रामाणिक गुरु, एक सच्चा गुरु अपने ऊपर कोई उत्तरदायित्व नहीं लेता। यही कारण है कि सद्गुरु के पास कभी भी बहुत अधिक अनुयायी नहीं होते। क्योंकि कौन ऐसे आदमी का अनुगमन करेगा, जो उत्तरदायित्व लेने को तैयार न हो।

जो तुम्हें कोई अफीम या आशा नहीं देता। इसके विपरीत वह तुम्हारी सभी आशाएं, तुम्हारे सभी नशे छीन लेता है और जितना हो सके तुम्हें स्वच्छ, पवित्र, निर्दोष, शून्य और खाली बनाने का प्रयत्न करता है। जबकि वास्तविक गुरु ही तुम्हें स्वतंत्रता देता है। उसकी पूरी कोशिश तुम्हें पूर्ण रूप से स्वतंत्र बनाने की होगी। लेकिन तुम स्वतंत्रता से भयभीत हो।

जरा अपने मन के काम करने का ढंग देखो। क्या तुम स्वतंत्रता नहीं चाहते? यदि तुम अपने गहरे भीतर झांको, तो तुम अपने भय देख सकोगे। तुम स्वतंत्रता से भयभीत हो, क्योंकि स्वतंत्र होने का तात्पर्य है कि तुम्हें अकेले अपने पैरों पर खड़ा होना होगा। और लोग अकेले होने से बहुत भयभीत हैं। वे सोचते हैं कि काश, यदि वे दो होते तो..।

भीड़ के साथ हो जाने का मतलब यह नहीं है कि अकेलापन चला गया। जब तुम अपना उत्तरदायित्व किसी को सौंपते हो, तो सोचते हो कि अब तुम्हारा उत्तरदायित्व समाप्त हो गया। यह संभव नहीं। तुम्हें ही उत्तरदायी होना है। बिना उत्तरदायित्व के तुम हो ही नहीं। केवल मृत लोगों पर कोई उत्तरदायित्व नहीं होता।

यह याद रखो कि तुम जितने अधिक जीवंत होते हो, उतने अधिक उत्तरदायी होते हो। और जितने अधिक जीवंत होगे, उतनी ही अधिक स्वतंत्रता की आवश्यकता होगी- काम करने के लिए, सृजन के लिए, अपने होने के लिए।

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