Lovedeep Kapila

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Instant Preyer

Jan 152018

 

Instant Preyer

आजकल भागदौड़ भरी ज़िंदगी है। हरेक इंसान के पास अपनों के लिए तो रहने दो उसके खुद के लिए समय नहीं है। ज्यादातर इंसान अलादीन के चिराग के तरह इच्छा पूर्ति के साथ जीना पसंद करते हैं। और चाहते है की जब उन्होंने मांग की तो तुंरत उनकी इच्छा पूरी हो जाये। लेकिन वो खुद कोई काम नहीं करना चाहते।
जबकि उनके मां-बाप उनसे वही उम्मीद करते हैं की जो सेवा उन्होंने अपने माँ -बाप की की थी या उनके माँ -बाप ने उनके दादा -दादी की की थी। उनके बच्चे भी वैसा ही करें। रिश्तो की एहमियत समझे। सुबह जल्दी उठे नहा-धोकर भगवान् का नाम ले। बड़ो का आदर करें। और जब उनकी औलाद ऐसा नहीं करती तो कहीं न कहीं उनके मन को ठेस लगती हैं। आपसी मन मुटाव बढ़ता हैं। ()

आज की नई पीढ़ी कम समय में ज्यादा सोच विचार करती है। रिश्तों में एक जैसा (जैसे को तैसा ) व्यवहार चाहती है। अच्छे के साथ अच्छा और बुरे के साथ बुरा या फिर किनारा कर लेते हैं। जिस काम में समय ज्यादा लगाना पड़े उसको टाल देती है। ज्यादा सब्र नहीं रख पाती। जिसके कारण भगवान को भी ज्यादा समय नहीं देते। उन्हें लगता है की सारा काम उन्हें ही करना पड़ेगा। भगवान के किये कुछ नहीं होगा। लेकिन जब ज़िंदगी में मुश्किलें आती हैं तो यही नई पीढ़ी भगवान् से मांगने पहुँच जाती है। लेकिन सही दंग से भगवान् से कैसे मांगे इसकी जानकारी नहीं होती। हमारे मंत्र भी काफी कठिन और लम्बे होते है। जिसका सही उच्चारण न कर पाने के कारण और समय न होने के कारण नई पीढ़ी पाठ नहीं कर पाती। 
सबसे पहले बात करते है रामायण जी की। हमारे ग्रंथो में एक श्लोकी रामायण का वर्णन दिया हुआ है। जिसके उच्चारण में बहुत काम समय लगता है। लेकिन जिसका फल सारी रामायण पढ़ने के बराबर मिलता है। :--

 

आदौ रामतपोवनादिगमनं हत्वा मृगं काञ्चनं

वैदेहीहरणं जटायुमरणं सुग्रीवसम्भाषणम्।

बालीनिग्रहणं समुद्रतरणं लंकापुरी दाहनं

पश्चाद्रावण कुम्भकर्ण हनन मेतद्धि रामायणम्।।

एक श्लोकी भागवत :--

आदौ देवकी देव गर्भजननं, गोपी गृहे वद्र्धनम्।
माया पूज निकासु ताप हरणं गौवद्र्धनोधरणम्।।
कंसच्छेदनं कौरवादिहननं, कुंतीसुपाजालनम्।
एतद् श्रीमद्भागवतम् पुराण कथितं श्रीकृष्ण लीलामृतम्।।
अच्युतं केशवं रामनारायणं कृष्ण:दामोदरं वासुदेवं हरे।
श्रीधरं माधवं गोपिकावल्लभं जानकी नायकं रामचन्द्रं भजे।।

एक श्लोकी दुर्गासप्तशती :--

या अंबा मधुकैटभ प्रमथिनी,या माहिषोन्मूलिनी,
या धूम्रेक्षण चन्ड मुंड मथिनी,या रक्तबीजाशिनी,
शक्तिः शुंभ निशुंभ दैत्य दलिनी,या सिद्धलक्ष्मी: परा,
सादुर्गा नवकोटि विश्व सहिता,माम् पातु विश्वेश्वरी

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