Lovedeep Kapila

Hello World

Who is the best in the devotees भगवान शिव और नारायण भक्त में श्रेष्ठ कौन

Jan 022018

 

एक बार भगवान नारायण अपने वैकुंठलोक में सोये हुए थे। स्वप्न में वो क्या देखते है कि करोड़ो चन्द्रमाओ कि कन्तिवाले, त्रिशूल-डमरू-धारी, स्वर्णाभरण -भूषित, संजय-वन्दित , अणिमादि सिद्धिसेवित त्रिलोचन भगवान शिव प्रेम और आनंदातिरेक से उन्मत होकर उनके सामने नृत्य कर रहे है। उन्हें देखकर भगवान विष्णु हर्ष-गदगद से सहसा शैयापर उठकर बैठ गये और कुछ देर तक ध्यानस्थ बैठे रहे। उन्हें इस प्रकार बैठे देखर श्री लक्ष्मी जी उनसे पूछने लगी कि "भगवान! आपके इस प्रकार उठ बैठने का क्या कारण है?"

भगवान ने कुछ देर तक उनके इस प्रश्न का कोई उत्तर नहीं दिया और आनंद में निमग्न हुए चुपचाप बैठे रहे। अंत में कुछ स्वस्थ होने पर वे गदगद-कंठ से इस प्रकार बोले - "हे देवि! मैंने अभी स्वप्न में भगवान श्री महेश्वर का दर्शन किया है, उनकी ऐसी अपूर्व आनंदमय एवं मनोहर छवि थी कि देखते ही बनती थी। मालूम होता है, शंकर ने मुझे स्मरण किया है। अहोभाग्य! चलो, कैलाश में चलकर हमलोग महादेव के दर्शन करते है।

यह कहकर दोनों कैलाश की और चल दिए। मुश्किल से आधी दूर ही गये होंगे की देखते है भगवान शंकर स्वयं गिरिजा के साथ उनकी और आ रहे है, अब भगवान के आनंद का क्या ठिकाना? मानो घर बैठे निधि मिल गई। पास आते ही दोनों परस्पर बड़े प्रेम से मिले। मानो प्रेम और आनंद का समुन्द्र उमड़ पड़ा। एक दुसरे को देखकर दोनों के नेत्रों से आन्दाश्रू बहने लगे और शरीर पुलकायमान हो गया।undefined

दोनों ही एक दुसरे से लिपटे हुए कुछ देर मुक्वत खड़े रहे। प्रश्नोतर होनेपर मालूम हुए की शंकर जी ने भी रात्रि में इसी प्रकार का स्वप्न देखा मानो विष्णु भगवान को वे उसी रूप में देख रहे है। जिस रूप में वे अब उनके सामने खड़े थे। दोनों के स्वप्न का वृतांत अवगत होने पर दोनों ही लगे एक दुसरे से अपने यहाँ लिवा ले जाने का आग्रह करने। नारायण कहते वैकुण्ठ चलो और शम्भू कहते कैलाश की और प्रस्थान कीजिये। दोनों के आग्रह में इतना अलौकिक प्रेम था कि यह निर्णय करना कठिन हो गया कि कहाँ चला जाये?

इतने में ही क्या देखते है वीणा बजाते, हरिगुण गाते नारद जी कही से आ निकले। बस, फिर क्या था? दोनों ही उनसे निर्णय कराने लगे कि कहाँ चला जाये?

बेचारे नारद जी स्वयं परेशान थे उस अलौकिक मिलन को देखकर। वे तो स्वयं अपनी सुध-बुध भूल गये और लगे मस्त होकर दोनों का गुणगान करने। अब निर्णय कौन करे? अंत में यह तय हुई कि भगवती उमा जो कह दे वही ठीक है।

भगवती उमा पहले तो कुछ देर चुप रही। अंत में दोनों को लक्ष्य करके बोली, "हे नाथ! हे नारायण! आपलोगों के निश्छल, अनन्य एवम अलौकिक प्रेम को देखकर तो यही समझ में आता है कि आपके निवास-स्थान अलग-अलग नहीं है। जो कैलास है वही वैकुण्ठ है और जो वैकुण्ठ है वही कैलाश है। केवल नाम में ही भेद है। यही नहीं , मुझे तो ऐसा प्रतीत होता है कि आपकी आत्मा भी एक ही है। केवल शरीर देखने में दो है।

और तो और, मुझे तो अब यह स्पष्ट दिखने लगा ही आपके भार्याये भी एक ही है, दो नहीं। जो मै हूँ वही श्रीलक्ष्मी है। और जो श्रीलक्ष्मी है वही मै हूँ। केवल इतना ही नहीं, मेरी तो अब यह दृढ धारणा हो गई है कि आप लोगों में से एक के प्रति जो द्वेष करता है। वह मानो दुसरे के प्रति ही द्वेष करता है। एक की जो पूजा करता है। वह स्वाभाविक ही दुसरे कि भी करता है और जो एक को अपूज्य मानता है वह दुसरे कि भी पूजा नहीं करता। मै तो यह समझती हूँ , कि आप दोनों में जो भेद मानता है। उसका चिरकाल तक घोर पतन होता है। मै देखती हूँ कि, आप मुझे इस प्रसंग में अपना मध्यस्थ बनाकर मानो मेरी प्र्वच्चना कर रहे है। मुझे चक्कर में डाल रहे है। मुझे भुला रहे है। अब मेरी यह प्रार्थना है कि आपलोग दोनों ही अपने-अपने लोक को पधारिये। श्रीविष्णु यह समझे कि हम शिवरूप में से वैकुण्ठ जा रहे है और महेश्वर यह माने कि हम विष्णुरूप से कैलाश गमन कर रहे है।

इस उत्तर को सुनकर दोनों परम प्रसन्न हुए और भगवती उमा कि प्रशंसा करते हुए दोनों अपने अपने लोक को चले गये। लौटकर जब विष्णु वैकुण्ठ पहुंचे तो श्री लक्ष्मी जी उनसे पूछने लगी कि - 'प्रभु! सबसे अधिक प्रिय आपको कौन है? इस पर भगवान बोले - 'प्रिय! मेरे प्रियतम केवल श्री शंकर है। देहधारियो को अपने देह कि भांति वे मुझे अकारण ही प्रिय है। एक बार मै और शंकर दोनों ही पृथ्वी पर घुमने निकले। मै अपने प्रियतम की खोज में इस आशय से निकला कि मेरी ही तरह जो अपने प्रियतम की खोज में देश-देशांतर में भटक रहा होगा। वही मुझे अकारण प्रिय होगा। थोड़ी देर के बाद ही मेरी श्री शंकर जी से भेंट हो गई। ज्यो ही हम लोगों की चार आँखे हुई कि हमलोग पुर्वजन्मअर्जित विद्या कि भांति एक दुसरे कि प्रति आक्रष्ट हो गये, "वास्तव में मै ही जनार्दन हूँ। और मै ही महादेव हूँ।

अलग-अलग दो घडो में रखे हुए जल कि भांति मुझ में और उनमे कोई अंतर नहीं है। शंकरजी के अतिरिक्त शिवजी की अर्चना करने वाला शिवभक्त भी मुझे अत्यंत प्रिय है। इसके विपरीत जो शिव कि पूजा नहीं करते वे मुझे कदापि प्रिय नहीं हो सकते। शिव-द्रोही वैष्णवों को और विष्णु-द्वेषी शैवोको इस प्रसंग पर ध्यान देना चाहिए।

अब बोलो जय माता दी जी। फिर से बोले जय माता दी। हर हर महादेव। जय जय श्री कृष्णा। जय श्री नारायणा।

Glimpse of GOD भगवान के दर्शन

Jan 012018

लवली  नामक इंसान भगवान को बहुत मानता था। लेकिन अपने दु:खो से बहुत दुखी रहता था। सोचता था की इतना भगवान को याद करता हूँ, फिर भी दुःख पीछा नहीं छोड़ते। काश कोई सिद्दी होती तो दुखों से छुटकारा हो जाता। एक बार एक सिद्ध पुरुष से उसे एक सात्विक सिद्दी का पता चला। जिसमें 6 महीने तक भगवान की आराधना करनी थी। जिससे उसको भगवान के दर्शन होने थे।

उसने 8 महीनों तक विधिपुवर्क तपस्या की। लेकिन उसको किसी प्रकार की सिद्दी प्राप्त नहीं हुई। अचानक एक दिन जसप्रीत नामक दोस्त से उसकी मुलाकात हुई। मुलाकात के दौरान जसप्रीत ने उसको पल भर में मनचाही वस्तुए मंगवाकर दी। तब लवली ने जसप्रीत से पुछा की यह सब तुमने कैसे संभव किया। जसप्रीत ने कहा की मैंने एक भूत सिद्द किया हुआ है। उसके कारण ही मैं हर चीज पल भर में मंगवा लेता हूँ।undefined

उसको 3 दिन में सिद्द किया जा सकता है। तब लवली ने जसप्रीत से उस विधि का ज्ञान लिया और 3 दिन में उस विधि को किया। लेकिन इस बार भी उसको कोई सिद्दी प्राप्त नहीं हुई। वो बहुत परेशान हुआ और जसप्रीत को आकर मदद करने को कहा। जसप्रीत आया और भूत को याद किया। भूत झट से आ गया। पूछने पर भूत ने बताया की तुम्हारे दोस्त ने जो भागवत सिद्दी की हुई है, उसके कारण उसके शरीर से बहुत ताप निकल रहा है।

जिसके कारण मैं उसके पास जा नहीं पा रहा हूँ। ऐसा सुनकर लवली अपनी तपस्या पर बहुत खुश हुआ। लेकिन उसने अपने दोस्त को भूत से पूछने को कहा की मुझे भगवान् के दर्शन क्यों नहीं हुए ? तब भूत ने बताया की तुम्हारें पिछले कर्मो के कारण तुम्हे दुःख दर्द थे। लेकिन तुम्हारें भगवान में आस्था के कारण तुम उन दुखों को सेहन कर पा रहे थे। तुमने जो भागवत ज्ञान लिया और सिद्दी की उसका असर पिछले कर्मो के दुखों को ख़तम करने में चला गया। यदि तुम थोड़े समय और तपस्या करते तो तुम्हे भगवान के दर्शन भी हो जाते और तुम सुखी भी रहने लगते। मगर तुम्हारें दुखों के कारण ही तुममें सब्र खत्म हो चूका है।

यदि इंसान भगवान से यह कहे की, हे भगवान सभी के लिए जो उत्तम हो वो करों, तो कभी दुःख न आये। मैं भी अपने लिए सुख और दूसरों के लिए दुःख मांगता था। तभी मेरी मृत्यु के बाद मुझे प्रेत योनी मिली है। और मैं इंसानों के मल-मूत्र पर अपना निर्वाह कर रहा हूँ। मैं अब जा रहा हूँ, मुझसे अब और ताप सेहन नहीं हो रहा। ऐसा कहकर भूत भाग गया। फिर अगले 6 हफ़्तों में ही लवली को अपनी सिद्दी में सफलता मिल गयी और भगवान के दर्शन हो गए। 

GOD's Unique Love with his Devoteeभगवान का अपने भक्त से अनोखा प्रेम

Dec 292017

एक राजा ने भगवान कृष्ण का एक मंदिर बनवाया और पूजा के लिए एक पुजारी को लगा दिया पुजारी बड़े भाव से बिहारीजी की सेवा करने लगे। भगवान की पूजा-अर्चना और सेवा-टहल करते पुजारी की उम्र बीत गई। राजा रोज एक फूलों की माला सेवक के हाथ से भेजा करता था। पुजारी वह माला बिहारी जी को पहना देते थे। जब राजा दर्शन करने आता तो पुजारी वह माला बिहारी जी के गले से उतारकर राजा को पहना देते थे। यह रोज का नियम था। एक दिन राजा किसी वजह से मंदिर नहीं जा सका।
उसने एक सेवक से कहा, "माला लेकर मंदिर जाओ। पुजारी से कहना, आज मैं नहीं आ पाउंगा"। सेवक ने जाकर माला पुजारी को दे दी और बता दिया कि आज महाराज का इंतजार न करें। सेवक वापस आ गया। पुजारी ने माला बिहारी जी को पहना दी। फिर उन्हें विचार आया कि आज तक मैं अपने बिहारी जी की चढ़ी माला राजा को ही पहनाता रहा। कभी ये सौभाग्य मुझे नहीं मिला। जीवन का कोई भरोसा नहीं कब रूठ जाए। आज मेरे प्रभु ने मुझ पर बड़ी कृपा की है। राजा आज आएंगे नहीं, तो क्यों न माला मैं पहन लूं। यह सोचकर पुजारी ने बिहारी जी के गले से माला उतारकर स्वयं पहन ली। इतने में सेवक आया और उसने बताया कि राजा की सवारी बस मंदिर में पहुंचने ही वाली है। यह सुनकर पुजारी कांप गए। उन्होंने सोचा अगर राजा ने माला मेरे गले में देख ली तो मुझ पर क्रोधित होंगे। इस भय से उन्होंने अपने गले से माला उतारकर बिहारीजी को फिर से पहना दी। जैसे ही राजा दर्शन को आया तो पुजारी ने नियम अुसार फिर से वह माला उतार कर राजा के गले में पहना दी। माला पहना रहे थे तभी राजा को माला में एक सफ़ेद बाल दिखा। राजा को सारा माजरा समझ गया कि पुजारी ने माला स्वयं पहन ली थी और फिर निकालकर वापस डाल दी होगी। पुजारी ऐसा छल करता है, यह सोचकर राजा को बहुत गुस्सा आया। उसने पुजारी जी से पूछा, "पुजारीजी यह सफ़ेद बाल किसका है"? पुजारी को लगा कि अगर सच बोलता हूं, तो राजा दंड दे देंगे इसलिए जान छुड़ाने के लिए पुजारी ने कहा, "महाराज यह सफ़ेद बाल तो बिहारीजी का है। अब तो राजा गुस्से से आग- बबूला हो गया कि ये पुजारी झूठ पर झूठ बोले जा रहा है। भला बिहारीजी के बाल भी कहीं सफ़ेद होते हैं।
राजा ने कहा, "पुजारी अगर यह सफेद बाल बिहारीजी का है तो सुबह शृंगार के समय मैं आउंगा और देखूंगा कि बिहारीजी के बाल सफ़ेद है या काले ? अगर बिहारीजी के बाल काले निकले तो आपको फांसी हो जाएगी। राजा हुक्म सुनाकर चला गया। अब पुजारी रोकर बिहारी जी से विनती करने लगे प्रभु मैं जानता हूं। आपके सम्मुख मैंने झूठ बोलने का अपराध किया। अपने गले में डाली माला पुनः आपको पहना दी। आपकी सेवा करते-करते वृद्ध हो गया। यह लालसा ही रही कि कभी आपको चढ़ी माला पहनने का सौभाग्य मिले। इसी लोभ में यह सब अपराध हुआ। मेरे ठाकुर जी पहली बार यह लोभ हुआ और ऐसी विपत्ति आ पड़ी है। मेरे नाथ अब नहीं होगा ऐसा अपराध। अब आप ही बचाइए नहीं तो कल सुबह मुझे फाँसी पर चढा दिया जाएगा।"
पुजारी सारी रात रोते रहे। सुबह होते ही राजा मंदिर में आ गया। उसने कहा कि आज प्रभु का शृंगार वह स्वयं करेगा। इतना कहकर राजा ने जैसे ही मुकुट हटाया तो हैरान रह गया। बिहारी जी के सारे बाल सफ़ेद थे। राजा को लगा, पुजारी ने जान बचाने के लिए बिहारीजी के बाल रंग दिए होंगे। गुस्से से तमतमाते हुए उसने बाल की जांच करनी चाही। बाल असली हैं या नकली यब समझने के लिए उसने जैसे ही बिहारी जी के बाल तोडे, बिहारीजी के सिर से खून की धार बहने लगी। राजा ने प्रभु के चरण पकड़ लिए और क्षमा मांगने लगा। बिहारीजी की मूर्ति से आवाज आई, "राजा तुमने आज तक मुझे केवल मूर्ति ही समझा इसलिए आज से मैं तुम्हारे लिए मूर्ति ही हूँ। पुजारीजी मुझे साक्षात भगवान् समझते हैं। उनकी श्रद्धा की लाज रखने के लिए आज मुझे अपने बाल सफेद करने पड़े व रक्त की धार भी बहानी पड़ी तुझे समझाने के लिए"।

कहते है "समझो तो देव नहीं तो पत्थर " श्रद्धा हो तो उन्हीं पत्थरों में भगवान सप्राण होकर भक्त से मिलने आ जाएंगे।
।। श्री वृन्दावन बांके बिहारी लाल की जय हो ।

How is GOD Realization कैसे हो भगवान की प्राप्ति

Dec 282017

श्री अयोध्या जी में एक उच्च कोटि के संत रहते थे, इन्हें रामायण का श्रवण करने का व्यसन था। जहाँ भी कथा चलती वहाँ बड़े प्रेम से कथा सुनते, कभी किसी प्रेमी अथवा संत से कथा कहने की विनती करते।
एक दिन राम कथा सुनाने वाला कोई मिला नहीं। वही पास से एक पंडित जी रामायण की पोथी लेकर जा रहे थे। पंडित जी ने संत को प्रणाम् किया और पूछा की महाराज ! क्या सेवा करे ? संत ने कहा - पंडित जी, रामायण की कथा सुना दो परंतु हमारे पास दक्षिणा देने के लिए रुपया नहीं है, हम तो फक्कड़ साधु है। माला, लंगोटी और कमंडल के अलावा कुछ है नहीं और कथा भी एकांत में सुनने का मन है हमारा।
पंडित जी ने कहा - ठीक है महाराज , संत और कथा सुनाने वाले पंडित जी दोनों सरयू जी के किनारे कुंजो में जा बैठे।
पंडित जी और संत रोज सही समय पर आकर वहाँ विराजते और कथा चलती रहती। संत बड़े प्रेम से कथा श्रवण करते थे और भाव विभोर होकर कभी नृत्य करने लगते तो कभी रोने लगते।undefined
जब कथा समाप्त हुई तब संत में पंडित जी से कहा - पंडित जी, आपने बहुत अच्छी कथा सुनायी। हम बहुत प्रसन्न है, हमारे पास दक्षिणा देने के लिए रूपया तो नहीं है परंतु आज आपको जो चाहिए वह आप मांगो।
संत सिद्ध कोटि के प्रेमी थे, श्री सीताराम जी उनसे संवाद भी किया करते थे। पंडित जी बोले - महाराज हम बहुत गरीब है, हमें बहुत सारा धन मिल जाये। संत बोले - संत ने प्रार्थना की की प्रभु इसे कृपा कर के धन दे दीजिये। भगवान् ने मुस्कुरा दिया, संत बोले - तथास्तु। फिर संत ने पूछा - मांगो और क्या चाहते हो ? पंडित जी बोले - हमारे घर पुत्र का जन्म हो जाए। संत ने पुनः प्रार्थना की और श्रीराम जी मुस्कुरा दिए। संत बोले - तथास्तु, तुम्हें बहुत अच्छा ज्ञानी पुत्र होगा।
फिर संत बोले और कुछ माँगना है तो मांग लो । पंडित जी बोले - श्री सीताराम जी की अखंड भक्ति, प्रेम हमें प्राप्त हो । संत बोले - *नहीं ! यह नहीं मिलेगा।*
पंडित जी आश्चर्य में पड़ गए की महात्मा क्या बोल गए। पंडित जी ने पूछा - संत भगवान् ! यह बात समझ नहीं आयी। संत बोले - तुम्हारे मन में प्रथम प्राथमिकता धन, सम्मान, घर की है। दूसरी प्राथमिकता पुत्र की है और अंतिम प्राथमिकता भगवान् के भक्ति की है। जब तक हम संसार को, परिवार, धन, पुत्र आदि को प्राथमिकता देते है तब तक भक्ति नहीं मिलती।
भगवान् ने जब केवट से पूछा की तुम्हें क्या चाहिए ? केवट ने कुछ नहीं माँगा।
प्रभु ने पूछा - तुम्हें बहुत सा धन देते है, केवट बोला नहीं। प्रभु ने कहा - ध्रुव पद ले लो, केवट बोला - नहीं । इंद्र पद, पृथ्वी का राजा, और मोक्ष तक देने की बात की परंतु केवट ने कुछ नहीं लिया तब जाकर प्रभु ने उसे भक्ति प्रदान की।
हनुमान जी को जानकी माता ने अनेको वरदान दिए - बल, बुद्धि , सिद्धि, अमरत्व आदि परंतु उन्होंने कुछ प्रसन्नता नहीं दिखाई। अंत में जानकी जी ने श्री राम जी का प्रेम, अखंड भक्ति का वर दिया।
प्रह्लाद जी ने भी कहा की *हमारे मन में मांगने की कभी कोई इच्छा ही न उत्पन्न हो तब भगवान् ने अखंड भक्ति प्रदान की।

We ask right or God give right?

Dec 172017

एक बच्चा अपनी मां के साथ एक दुकान में गया। दुकान में तरह-तरह की टॉफियां भिन्न-भिन्न जारों में सजी हुई थीं। बच्चा टॉफियों को देखकर लालायित हो उठा। बच्चे की भोली आंखों पर दुकानदार मोहित हो गया। वह बच्चे से बोला, तू कोई भी टॉफी ले ले। दुकानदार की बात सुनकर बच्चे ने दुकानदार से कहा, मुझे नहीं चाहिए। दुकानदार ने बच्चे को हैरानी से देखा और कहा, तू कोई भी टॉफी ले ले, मैं पैसे नहीं लूंगा। बच्चे की मां ने भी उससे कहा, बेटे, तू कोई भी टॉफी ले ले। बच्चे ने फिर मना कर दिया। मां और दुकानदार हैरान हो गए।

तभी दुकानदार ने स्वयं जार में हाथ डाला और बच्चे की तरफ मुट्ठी बढ़ाई। बच्चे ने झट से अपने स्कूल के बस्ते में टॉफियां डलवा लीं। दुकान से बाहर आने पर मां ने बच्चे से कहा, जब तुझे टॉफियां लेने को कहा गया, तो मना कर दिया और जब दुकानदार ने टॉफियां दीं तो इतनी सारी ले लीं। बच्चे ने मां से कहा, मां, मेरी मुट्ठी बहुत ही छोटी है, परंतु दुकानदार की मुट्ठी बहुत बड़ी है। मैं लेता तो कम मिलतीं।

यही हाल हमारा है। हमारी मुट्ठी बहुत छोटी है और प्रभु की बहुत बड़ी। इसी तरह हमारी सोच बहुत छोटी है और प्रभु की बहुत बड़ी। अर्थात प्रभु ने हमें जो भी दिया है, वह हमारी सोच से कहीं ज्यादा है। आज से 25 वर्ष पहले यदि आपको वस्तुओं के लिए इच्छाओं की सूची बनाने को बोला जाता, तो शायद वह आज के संदर्भ में बहुत छोटी होती। आज हमें प्रभु ने या प्रकृति ने इतना कुछ दिया है, जो हमारी सोच से भी बड़ा है। इसलिए प्रभु की सोच हमारे लिए विशाल और व्यापक है।undefined

श्रीमद्भगवत गीता के मध्य के श्लोक में श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं-अनन्यातियांतो मार्य जना: पर्युपासते। तेषा नित्याभियुक्ताना योगक्षेम वहाम्यत्म..। अर्थात जो अनन्य भाव से मेरा निरंतर चिंतन करते हुए भजते हैं, उनको योग, क्षेम (सांसारिक और आध्यात्मिक सुख) मैं स्वयं ही प्राप्त करवा देता हूं।

इस बात को समझना होगा। भजना सजा नहीं है, बल्कि मजा है। यह बात मात्र प्रभु के विषय में ही नहीं, अपितु हर वस्तु और विषय पर लागू होती है। आप जिस भी वस्तु या विषय को भजें, उसे पूर्णता से भजें। अर्थात जो भी कार्य करें, उसे पूर्णता से करें। भजना अर्थात उसे जीवन में अंगीकार करना। भजना अर्थात आपके और उस वस्तु विषय में कोई भी अंतर न रहे।

किसी व्यक्ति के मन में यह सोच आ सकती है कि कहीं आध्यात्म में आने के बाद यह जीवन का सफर फटे बादल की तरह व्यर्थ तो नहीं हो जाएगा? इस विचार का तोड़ भगवान स्वयं गीता में कहते हैं- जो भी व्यक्ति अपने जीवन में श्रेष्ठ नियमों को अपनाता है, उसकी कभी दुर्गति नहीं होती।

हम अपने कर्म पूरी दक्षता से करें तथा कर्म के फल को प्रभु को अर्पण कर दें। उस सोच को कभी न भूलें कि हमारी मुट्ठी बहुत छोटी है और प्रभु की मुट्ठी बहुत बड़ी है।

Responsibility

Dec 162017

उत्तरदायित्व सदैव ही स्वतंत्रता का सबसे पहला कदम है। किसी दूसरे के कंधों पर उत्तरदायित्व डाल देना, स्वतंत्रता के अवसर को चूक जाना है। गंवा देना है। उत्तरदायित्व और स्वतंत्रता को अलग-अलग नहीं किया जा सकता। वे अविभाज्य रूप से एक हैं।

यह सच है कि संपूर्ण उत्तरदायित्व शिष्य का ही है। गुरु तो केवल एक उत्प्रेरक या एक बहाना ही है। परंतु उत्तरदायित्व को स्वीकार करना हिम्मत का काम है। स्वतंत्रता तो हर कोई चाहता है, पर उत्तरदायित्व कोई भी नहीं लेना चाहता। लेकिन समस्या यह है कि स्वतंत्रता और उत्तरदायित्व साथ-साथ रहते हैं। यदि तुम उत्तरदायित्व नहीं चाहते, तो किसी न किसी रूप में गुलाम जरूर बना लिए जाओगे।

यह गुलामी आध्यात्मिक भी हो सकती है, जो संभवत: सबसे बुरी गुलामी है। राजनैतिक, आर्थिक गुलामी तो ऊपरी हैं, बनावटी हैं। तुम उनके खिलाफ आसानी से विद्रोह कर सकते हो। लेकिन आध्यात्मिक गुलामी इतनी गहरी है कि उसके खिलाफ विद्रोह करने का खयाल ही नहीं आता। सीधा-सा कारण यह है कि यह गुलामी है ही इसलिए, क्योंकि तुमने इसे स्वयं चाहा है।

स्वयं मांगा है। दूसरी गुलामियां तुम्हारे ऊपर लादी जाती हैं। उन्हें तुम उतारकर फेंक सकते हो, लेकिन आध्यात्मिक गुलामी तुम्हें इच्छा के विपरीत नहीं लगती। यह एक बड़ी सांत्वना मालूम पड़ती है। यह सांत्वना कि तुम्हारे उत्तरदायित्व किसी ऐसे व्यक्ति ने अपने ऊपर ले लिया है, जो जानता है कि अब तुम्हें चिंता करने की आवश्यकता नहीं है। लेकिन स्मरण रहे, उत्तरदायित्व के साथ-साथ तुमने स्वतंत्रता भी गंवा दी, क्योंकि तुमने उससे अपेक्षा कर ली।undefined

अपेक्षा एक बंधन है। देर-सबेर यह निराशा में ले जाती है। गुरु-शिष्य का संबंध आशा-अपेक्षाओं का संबंध नहीं है। लेकिन तुम्हारा जीवन अपेक्षाओं से भरा हुआ है। इसीलिए जब तुम गुरु के पास भी आते हो, तब भी तुम्हारा मन अपेक्षाएं लगा लेता है। यदि कोई गुरु तुम्हारी अपेक्षाएं पूरी करने को तैयार है, तो वह गुरु नहीं है। वह केवल तुम्हारा शोषण कर रहा है।

कोई सद्गुरु यह नहीं कहता कि मैं तुम्हारी अपेक्षाएं पूरी करूंगा। वह केवल इतना ही कह सकता है कि मैं तुम्हारी सभी अपेक्षाएं नष्ट कर दूंगा, क्योंकि इसके बिना तुम्हारा पुराना, सड़ा-गला मन नष्ट नहीं किया जा सकता। तुम्हारी पुरानी आदतें तुम्हारी चेतना अस्तित्व के विकास में बाधक हैं, दूर नहीं की जा सकतीं।

प्रामाणिक गुरु अपने ऊपर उत्तरदायित्व नहीं लेता। सच तो यह है कि सिर्फ मिथ्या गुरु ज्यादा ही अवतार या पैगंबर, एक रक्षक, एक मसीहा, एक संदेशवाहक होने के खयाल का मजा ले सकता है। केवल वही है, जो तुम्हारी कमजोरियों का लाभ उठा रहा है। वह तुमसे कह सकता है कि बस मुझ पर विश्वास करो और तुम बचा लिए जाओगे। तुम्हें यह बड़ा सस्ता और सरल लगता है।

मनुष्यता की शुरुआत से ही ऐसे लोग रहे हैं, जो आदमी की कमजोरियों का फायदा उठाते रहे हैं। आदमी की सबसे बड़ी कमजोरियों में एक यह है कि वह मुफ्त में ही सब कुछ पाना चाहता है। यदि ईश्वर के अस्तित्व का विश्वास करने से ही स्वर्ग मिल जाए और यदि रक्षक सच में हो बचाने वाला, तब तुम खो कुछ नहीं रहे हो, सिर्फ पा रहे हो। तुम्हें भले ही न मिले, लेकिन मिलने की आशा में तो रहोगे। धार्मिक लोग तो तुम्हें आशा देते रहे हैं।

कार्ल मा‌र्क्स कहा करते थे कि धर्म भीड़ के लिए अफीम का नशा है, पर वह इस तथ्य के गहन विश्लेषण में कभी नहीं गए। क्या है अफीम? आशा अफीम है। वे तुम्हें आशा देते हैं। वे तुम्हें कुछ नहीं के बदले सब कुछ देने को तैयार हैं। बस विश्वास करो, सारा उत्तरदायित्व उन्हें सौंप दो। और तुम इस बात के लिए सजग नहीं हो कि जिस क्षण तुमने अपना उत्तरदायित्व उन्हें सौंपा, तुमने अपनी स्वतंत्रता भी उन्हें दे दी।

उनकी रुचि, उनकी उत्सुकता केवल तुम्हारी स्वतंत्रता में है। स्वतंत्रता की बात वे तुमसे नहीं करते। वे तुमसे यह नहीं कहते, अपनी स्वतंत्रता हमें दे दो, क्योंकि कोई अपनी स्वतंत्रता उन्हें नहीं देगा। वे कहते हैं, अपना उत्तरदायित्व हमें दे दो, क्योंकि लोगों को अपना उत्तरदायित्व बोझ मालूम पड़ता है। लेकिन इस तथ्य के प्रति तुम जागरूक नहीं हो कि उत्तरदायित्व के साथ-साथ ही तुम्हारी स्वतंत्रता भी खो जाती है। तुम एक गुलाम बन जाते हो।

संपूर्ण मनुष्य-जाति अलग-अलग तरह के लोगों द्वारा गुलाम बना ली गई है, पर गुलामी एक ही है। एक प्रामाणिक गुरु, एक सच्चा गुरु अपने ऊपर कोई उत्तरदायित्व नहीं लेता। यही कारण है कि सद्गुरु के पास कभी भी बहुत अधिक अनुयायी नहीं होते। क्योंकि कौन ऐसे आदमी का अनुगमन करेगा, जो उत्तरदायित्व लेने को तैयार न हो।

जो तुम्हें कोई अफीम या आशा नहीं देता। इसके विपरीत वह तुम्हारी सभी आशाएं, तुम्हारे सभी नशे छीन लेता है और जितना हो सके तुम्हें स्वच्छ, पवित्र, निर्दोष, शून्य और खाली बनाने का प्रयत्न करता है। जबकि वास्तविक गुरु ही तुम्हें स्वतंत्रता देता है। उसकी पूरी कोशिश तुम्हें पूर्ण रूप से स्वतंत्र बनाने की होगी। लेकिन तुम स्वतंत्रता से भयभीत हो।

जरा अपने मन के काम करने का ढंग देखो। क्या तुम स्वतंत्रता नहीं चाहते? यदि तुम अपने गहरे भीतर झांको, तो तुम अपने भय देख सकोगे। तुम स्वतंत्रता से भयभीत हो, क्योंकि स्वतंत्र होने का तात्पर्य है कि तुम्हें अकेले अपने पैरों पर खड़ा होना होगा। और लोग अकेले होने से बहुत भयभीत हैं। वे सोचते हैं कि काश, यदि वे दो होते तो..।

भीड़ के साथ हो जाने का मतलब यह नहीं है कि अकेलापन चला गया। जब तुम अपना उत्तरदायित्व किसी को सौंपते हो, तो सोचते हो कि अब तुम्हारा उत्तरदायित्व समाप्त हो गया। यह संभव नहीं। तुम्हें ही उत्तरदायी होना है। बिना उत्तरदायित्व के तुम हो ही नहीं। केवल मृत लोगों पर कोई उत्तरदायित्व नहीं होता।

यह याद रखो कि तुम जितने अधिक जीवंत होते हो, उतने अधिक उत्तरदायी होते हो। और जितने अधिक जीवंत होगे, उतनी ही अधिक स्वतंत्रता की आवश्यकता होगी- काम करने के लिए, सृजन के लिए, अपने होने के लिए।

What is prayer - क्या है प्रार्थना

Dec 162017

दुआ बहार की मांगी तो इतने फूल खिले

कहीं जगह न मिली मेरे आशियाने को..।


मैँ हूं दुआ.. प्रार्थना.. प्रेयर..। मुझे जिसने अपने मन में बसाया, अपने सफर का साथी बनाया, मैं उसका साया बन गई। मैंने उसकी जिंदगी में तमाम फूल खिला दिए। मेरे चाहने वालों ने मुझे अपने कंठ में माला की तरह धारण कर लिया। किसी योगी की तरह।

इंसान ने जब से पंच-तत्वों की शक्ति को पहचाना, तभी से मेरा जन्म हुआ। प्रकृति के कोप से सुरक्षा के लिए हाथ उठे। आग, हवा, पानी का कहर थमा तो इंसान की आस्था बढ़ी कि जरूर कोई शक्ति है, जो सब कुछ नियंत्रित करती है। उसके ही अधीन सब हैं। मुझे नहीं मालूम कि वह शक्ति कहां है, कैसी है। वह निराकार है या साकार। मगर मैं इतना जरूर जानती हूं कि जिसने भी दिल से एक बार भगवान के आगे हाथ जोड़े, रब से खैर मांगी, उसकी जिंदगी में बदलाव की बयार बहने लगी। विज्ञान भी मेरी शक्ति को कुबूल कर चुका है। प्रयोगों में यह साबित हुआ कि प्रार्थना से एक नई सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। बताती हूं कि आखिर मैं कैसे बुरे हालात में इंसान के काम आती हूं?

असल में जब भी कोई प्रार्थना के लिए हाथ उठाता या जोड़ता है या अपना शीश नवाता है, मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे, गिरजाघर या देवता के सामने ध्यान लगाकर दुखों से छुटकारे की कामना करता है, वह एक तरीके से खुद को ही अंदरूनी तौर पर हालात से निपटने के लिए तैयार करता है। मेरी वजह से उसके अंदर एक विश्वास पैदा होने लगता है। उसे लगता है कि अब उसकी जिंदगी से विपत्तियां टल जाएंगी। उसका अच्छा वक्त शुरू हो जाएगा। ऐसा सोचते ही उसे अपने भीतर एक नई आध्यात्मिक शक्ति आत्मबल का अहसास होता है। यह सकारात्मक भावना उसमें वक्त और हालात से लड़ने की नई शक्ति देती है और वह संयम और धैर्य से बिगड़े हालात से लोहा लेने चल पड़ता है। जिंदगी के संघर्ष में हौसले से कूद पड़ता है। मैं यह तो नहीं कह सकती कि प्रार्थना करने वाले को अदृश्य शक्ति से कोई मदद मिलती है या नहीं, लेकिन उसमें जो परिवर्तन आता है, वह उसे जिंदगी की जंग के लिए तैयार कर देता है। किसी ने कहा है :

कश्ती रवां-गवां है इशारा है नाखुदा

तूफान में कश्ती का सहारा है नाखुदाundefined

अर्थात कश्ती अगर तूफान के भंवर में फंस जाती है, तो एकमात्र सहारा मल्लाह ही होता है। असल में हमारी जिंदगी हालात के भंवर में हिचकोले खाती एक कश्ती (नाव) ही तो है, जिसके नाखुदा (मल्लाह) हम ही हैं। हौसला है तो हम लहरों से पार पा जाते हैं। भंवर से निकल जाते हैं, लेकिन हममें साहस नहीं तो फिर डूबना तय है। मैं साहस देकर डूबने से बचाती हूं।

कोई मंगलवार को हनुमान के दर्शन को जाता है, कोई गुरुवार को खानाख्वाहों में मत्था टेकता है, कोई रविवार को चर्च में प्रभु के आगे प्रेयर कर सुकून पाता है। बेशक मेरे तरीके हर धर्म-संप्रदाय में अलग-अलग हैं, मगर मेरा फलसफा बस एक ही है- भले की कामना।

प्रार्थना अपने लिए ही नहीं, दूसरों के लिए भी होती है। प्रार्थना सार्वभौमिक है। संपूर्ण सृष्टि के लिए है। जापान की सुनामी के लिए हमारे देश और दुनिया में कितनी प्रार्थना सभाएं हुईं। मदद देने के साथ मेरा भी सहारा लिया गया। सच तो यह है कि इंसानों की भी अपनी सीमा है। कितने लोग ऐसे हैं, जो बुरे हालात में भले ही किसी की मदद न कर सकते हों, लेकिन मेरी शरण में आकर उनके अच्छे की कामना तो कर ही सकते हैं। जीवन की हर परीक्षा में मैं अपने चाहने वालों के साथ रहती हूं।

प्रभु ईसा मसीह के अनुयायी मेरी चंगाई सभाओं में भी बहुत विश्वास रखते हैं। चंगाई सभा में मंच से फादर प्रभु के आज्जन की प्रार्थना करते हैं। ऐसी सभाओं में चलने-फिरने में असमर्थ लोग चलने-फिरने लायक होने का दावा करते हैं। पलों में प्रार्थना से घटने वाला यह चमत्कार लोगों की मुझमें आस्था तो बढ़ाता ही है, उन्हें अभिभूत भी कर देता है। चंगे होकर लोग घर लौटते हैं और मेरे महत्व की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हैं।

आज दुनिया में कितने लोग हैं, जिन्हें फरिश्तों की तरह माना जाता है। दरअसल, जिन लोगों ने अपना पूरा जीवन मानवता की सेवा और प्रभु की प्रार्थना में लगा दिया, उनकी दुआ जरूर कुबूल होती है। वे चाहे जिसके लिए भी मेरी मदद लें। मेरे जरिये मदद के लिए इंसान का नेक अमल होना जरूरी है। उसके इरादे और नीयत साफ होनी चाहिए। अगर किसी के बुरे के लिए इंसान हाथ उठाएगा, तो वह दुआ कहां होगी? वह तो बद्दुआ बन जाएगी। मैं पाखंडी, स्वार्थी और दूसरों का बुरा चाहने वालों को स्वीकार नहीं करती।

कहते हैं कि जब कुछ नहीं होता तो सिर्फ प्रार्थना होती है। कितनी बार इंसान ऐसे हालात में घिर जाता है, जहां मदद भी काम नहीं आती। तब मैं ही काम आती हूं। बड़े से बड़ा डॉक्टर भी जब किसी का इलाज करके हार जाता है, तो वह भी कहता है कि अब दवा के साथ दुआ की भी जरूरत है। इस्लाम में कहा गया है कि जब तक सांस चल रही है, इंसान अपने गुनाहों की माफी दुआ से मांग सकता है, मगर दुनिया से जाने के बाद व्यक्ति न तो दुआ कर सकता है न ही अपने गुनाहों की माफी मांग सकता है। उसकी आत्मा की शांति के लिए दूसरे लोग ही प्रार्थना कर सकते हैं।

भले ही अलग-अलग धर्मो में प्रार्थना के लिए अलग तरीका बताया गया हो, मगर सबका सार यही है कि हे प्रभु, अब तू ही मुझे हालात से निपटने की शक्ति देगा। मैं यही कहती हूं कि बस अच्छा सोचो, अच्छा करो और आगे बढ़ो। हालात से निराश मत हो। सकारात्मक रहो।

If you want a pleasant change in life

Dec 152017

 

एक दार्शनिक व्याख्यान लिख रहे थे। हाथ में पेंसिल लेकर चिंतन में मग्न थे। तभी उनका शिष्य आ गया। बोला- मैं जीवन में बड़ा परिवर्तन चाहता हूं.. लेकिन हो नहीं पा रहा है। दार्शनिक बोले - खुद को तराशो, धैर्य रखो और अपने गुणों को बढ़ाओ, बड़ा परिवर्तन आ जाएगा।
शिष्य बोला- ये तो छोटी-छोटी बातें हैं, इनसे बड़ा परिवर्तन कैसे आ जाएगा? दार्शनिक ने अपनी पेंसिल उठाई और बोले - यह छोटी-सी पेंसिल है, यह भी तुम्हारे जीवन में बड़ा परिवर्तन ला सकती है। शिष्य बोला - कैसे? उन्होंने बोलना शुरू किया - मान लो तुम पेंसिल हो। पेंसिल चले, इसके लिए एक हाथ की जरूरत है। वह हाथ गुरु का भी हो सकता है और ईश्वर का भी। अत: गुरु और ईश्वर में श्रद्धा रखो।undefined

अगर तुमने खुद को तराशा नहीं, तो तुम नहीं चल पाओगे। अपने गुणों को भी तराशो और मेधा को भी..। तराशने में कष्ट होता है, लेकिन उसे सहो। इसके लिए धैर्य पैदा करो। दुख, अपमान और हार को बर्दाश्त करना सीखो। यदि तुमसे कोई गलती हो गई है, तो उस गलती को सुधार लो।

अपने विवेक की रबड़ अपने पास अवश्य रखो। तुम्हारे बाहर की लकड़ी (शरीर) भले ही कमतर हो, लेकिन भीतर जो ग्रेफाइट की छड़ (अंतस) है, उसकी गुणवत्ता अच्छी होनी चाहिए, यानी अपने भीतर के विचारों को शुद्ध करो। क्या तब तुममें बड़ा परिवर्तन नहीं आ जाएगा..? दार्शनिक की बात सुनकर शिष्य चकित था।


कथा-मर्म : छोटी-छोटी चीजें ही जीवन में बड़ा परिवर्तन लाने में मददगार होती हैं।

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