Lovedeep Kapila

Hello World

महाशिवरात्रि की प्राचीन और पवित्र कथा

Feb 132018

पूर्व काल में चित्रभानु नामक एक शिकारी था। जानवरों की हत्या करके वह अपने परिवार को पालता था। वह एक साहूकार का कर्जदार था, लेकिन उसका ऋण समय पर न चुका सका। क्रोधित साहूकार ने शिकारी को शिवमठ में बंदी बना लिया। संयोग से उस दिन शिवरात्रि थी। शिकारी ध्यानमग्न होकर शिव-संबंधी धार्मिक बातें सुनता रहा। चतुर्दशी को उसने शिवरात्रि व्रत की कथा भी सुनी। शाम होते ही साहूकार ने उसे अपने पास बुलाया और ऋण चुकाने के विषय में बात की। शिकारी अगले दिन सारा ऋण लौटा देने का वचन देकर बंधन से छूट गया। अपनी दिनचर्या की भांति वह जंगल में शिकार के लिए निकला। लेकिन दिनभर बंदी गृह में रहने के कारण भूख-प्यास से व्याकुल था। शिकार खोजता हुआ वह बहुत दूर निकल गया। जब अंधकार हो गया तो उसने विचार किया कि रात जंगल में ही बितानी पड़ेगी। वह वन एक तालाब के किनारे एक बेल के पेड़ पर चढ़ कर रात बीतने का इंतजार करने लगा।बिल्व वृक्ष के नीचे शिवलिंग था जो बिल्वपत्रों से ढंका हुआ था। शिकारी को उसका पता न चला। पड़ाव बनाते समय उसने जो टहनियां तोड़ीं, वे संयोग से शिवलिंग पर गिरती चली गई। इस प्रकार दिनभर भूखे-प्यासे शिकारी का व्रत भी हो गया और शिवलिंग पर बिल्वपत्र भी चढ़ गए। एक पहर रात्रि बीत जाने पर एक गर्भिणी हिरणी तालाब पर पानी पीने पहुंची। शिकारी ने धनुष पर तीर चढ़ाकर ज्यों ही प्रत्यंचा खींची, हिरणी बोली, 'मैं गर्भिणी हूँ। शीघ्र ही प्रसव करूंगी। तुम एक साथ दो जीवों की हत्या करोगे, जो ठीक नहीं है। मैं बच्चे को जन्म देकर शीघ्र ही तुम्हारे समक्ष प्रस्तुत हो जाऊंगी, तब मार लेना।' शिकारी ने धनुष पर तीर चढ़ाकर ज्यों ही प्रत्यंचा खींची, हिरणी बोली, 'मैं गर्भिणी हूँ। शीघ्र ही प्रसव करूंगी। तुम एक साथ दो जीवों की हत्या करोगे, जो ठीक नहीं है। मैं बच्चे को जन्म देकर शीघ्र ही तुम्हारे समक्ष प्रस्तुत हो जाऊंगी, तब मार लेना।' कुछ ही देर बाद एक और हिरणी उधर से निकली। शिकारी की प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। समीप आने पर उसने धनुष पर बाण चढ़ाया। तब उसे देख हिरणी ने विनम्रतापूर्वक निवेदन किया, 'हे शिकारी! मैं थोड़ी देर पहले ऋतु से निवृत्त हुई हूं। कामातुर विरहिणी हूं। अपने प्रिय की खोज में भटक रही हूं। मैं अपने पति से मिलकर शीघ्र ही तुम्हारे पास आ जाऊंगी।'

शिकारी ने उसे भी जाने दिया। दो बार शिकार को खोकर उसका माथा ठनका। वह चिंता में पड़ गया। रात्रि का आखिरी पहर बीत रहा था। इस बार भी धनुष से लग कर कुछ बेलपत्र शिवलिंग पर जा गिरे तथा दूसरे प्रहर की पूजन भी सम्पन्न हो गई।undefined

तभी एक अन्य हिरणी अपने बच्चों के साथ उधर से निकली। शिकारी के लिए यह स्वर्णिम अवसर था। उसने धनुष पर तीर चढ़ाने में देर नहीं लगाई। वह तीर छोड़ने ही वाला था कि हिरणी बोली, 'हे शिकारी!' मैं इन बच्चों को इनके पिता के हवाले करके लौट आऊंगी। इस समय मुझे मत मारो।

शिकारी हंसा और बोला, सामने आए शिकार को छोड़ दूं, मैं ऐसा मूर्ख नहीं। इससे पहले मैं दो बार अपना शिकार खो चुका हूं। मेरे बच्चे भूख-प्यास से व्यग्र हो रहे होंगे। उत्तर में हिरणी ने फिर कहा, जैसे तुम्हें अपने बच्चों की ममता सता रही है, ठीक वैसे ही मुझे भी। हे शिकारी! मेरा विश्वास करों, मैं इन्हें इनके पिता के पास छोड़कर तुरंत लौटने की प्रतिज्ञा करती हूँ। हिरणी का दीन स्वर सुनकर शिकारी को उस पर दया आ गई। उसने उस मृगी को भी जाने दिया। शिकार के अभाव में तथा भूख-प्यास से व्याकुल शिकारी अनजाने में ही बेल-वृक्ष पर बैठा बेलपत्र तोड़-तोड़कर नीचे फेंकता जा रहा था। पौ फटने को हुई तो एक हृष्ट-पुष्ट मृग उसी रास्ते पर आया। शिकारी ने सोच लिया कि इसका शिकार वह अवश्य करेगा।

शिकारी की तनी प्रत्यंचा देखकर मृग विनीत स्वर में बोला, हे शिकारी! यदि तुमने मुझसे पूर्व आने वाली तीन मृगियों तथा छोटे-छोटे बच्चों को मार डाला है, तो मुझे भी मारने में विलंब न करो, ताकि मुझे उनके वियोग में एक क्षण भी दुख न सहना पड़े। मैं उन हिरणियों का पति हूं। यदि तुमने उन्हें जीवनदान दिया है तो मुझे भी कुछ क्षण का जीवन देने की कृपा करो। मैं उनसे मिलकर तुम्हारे समक्ष उपस्थित हो जाऊंगा।undefined

मृग की बात सुनते ही शिकारी के सामने पूरी रात का घटनाचक्र घूम गया, उसने सारी कथा मृग को सुना दी। तब मृग ने कहा, 'मेरी तीनों पत्नियां जिस प्रकार प्रतिज्ञाबद्ध होकर गई हैं, मेरी मृत्यु से अपने धर्म का पालन नहीं कर पाएंगी। अतः जैसे तुमने उन्हें विश्वासपात्र मानकर छोड़ा है, वैसे ही मुझे भी जाने दो। मैं उन सबके साथ तुम्हारे सामने शीघ्र ही उपस्थित होता हूँ।'

शिकारी ने उसे भी जाने दिया। इस प्रकार प्रात: हो आई। उपवास, रात्रि-जागरण तथा शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ने से अनजाने में ही पर शिवरात्रि की पूजा पूर्ण हो गई। पर अनजाने में ही की हुई पूजन का परिणाम उसे तत्काल मिला। शिकारी का हिंसक हृदय निर्मल हो गया। उसमें भगवद्शक्ति का वास हो गया। थोड़ी ही देर बाद वह मृग सपरिवार शिकारी के समक्ष उपस्थित हो गया, ताकि वह उनका शिकार कर सके।, किंतु जंगली पशुओं की ऐसी सत्यता, सात्विकता एवं सामूहिक प्रेमभावना देखकर शिकारी को बड़ी ग्लानि हुई। उसने मृग परिवार को जीवनदान दे दिया।

अनजाने में शिवरात्रि के व्रत का पालन करने पर भी शिकारी को मोक्ष की प्राप्ति हुई। जब मृत्यु काल में यमदूत उसके जीव को ले जाने आए तो शिवगणों ने उन्हें वापस भेज दिया तथा शिकारी को शिवलोक ले गए। शिव जी की कृपा से ही अपने इस जन्म में राजा चित्रभानु अपने पिछले जन्म को याद रख पाए तथा महाशिवरात्रि के महत्व को जान कर उसका अगले जन्म में भी पालन कर पाए। शिकारी की कथानुसार महादेव तो अनजाने में किए गए व्रत का भी फल दे देते हैं। पर वास्तव में महादेव शिकारी की दया भाव से प्रसन्न हुए। अपने परिवार के कष्ट का ध्यान होते हुए भी शिकारी ने मृग परिवार को जाने दिया। यह करुणा ही वस्तुत: उस शिकारी को उन पण्डित एवं पूजारियों से उत्कृष्ट बना देती है जो कि सिर्फ रात्रि जागरण, उपवास एव दूध, दही, एवं बेल-पत्र आदि द्वारा शिव को प्रसन्न कर लेना चाहते हैं।undefined

इस कथा में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस कथा में 'अनजाने में हुए पूजन' पर विशेष बल दिया गया है। इसका अर्थ यह नहीं है कि शिव किसी भी प्रकार से किए गए पूजन को स्वीकार कर लेते हैं अथवा भोलेनाथ जाने या अनजाने में हुए पूजन में भेद नहीं कर सकते हैं।

वास्तव में वह शिकारी शिव पूजन नहीं कर रहा था। इसका अर्थ यह भी हुआ कि वह किसी तरह के किसी फल की कामना भी नहीं कर रहा था। उसने मृग परिवार को समय एवं जीवन दान दिया जो कि शिव पूजन के समान है। शिव का अर्थ ही कल्याण होता है। उन निरीह प्राणियों का कल्याण करने के कारण ही वह शिव तत्व को जान पाया तथा उसका शिव से साक्षात्कार हुआ। परोपकार करने के लिए महाशिवरात्रि का दिवस होना भी आवश्यक नहीं है। पुराण में चार प्रकार के शिवरात्रि पूजन का वर्णन है। मासिक शिवरात्रि, प्रथम आदि शिवरात्रि, तथा महाशिवरात्रि। पुराण वर्णित अंतिम शिवरात्रि है-नित्य शिवरात्रि। वस्तुत: प्रत्येक रात्रि ही 'शिवरात्रि' है अगर हम उन परम कल्याणकारी आशुतोष भगवान में स्वयं को लीन कर दें तथा कल्याण मार्ग का अनुसरण करें, वही शिवरात्रि का सच्चा व्रत है।

Who is the best in the devotees भगवान शिव और नारायण भक्त में श्रेष्ठ कौन

Jan 022018

 

एक बार भगवान नारायण अपने वैकुंठलोक में सोये हुए थे। स्वप्न में वो क्या देखते है कि करोड़ो चन्द्रमाओ कि कन्तिवाले, त्रिशूल-डमरू-धारी, स्वर्णाभरण -भूषित, संजय-वन्दित , अणिमादि सिद्धिसेवित त्रिलोचन भगवान शिव प्रेम और आनंदातिरेक से उन्मत होकर उनके सामने नृत्य कर रहे है। उन्हें देखकर भगवान विष्णु हर्ष-गदगद से सहसा शैयापर उठकर बैठ गये और कुछ देर तक ध्यानस्थ बैठे रहे। उन्हें इस प्रकार बैठे देखर श्री लक्ष्मी जी उनसे पूछने लगी कि "भगवान! आपके इस प्रकार उठ बैठने का क्या कारण है?"

भगवान ने कुछ देर तक उनके इस प्रश्न का कोई उत्तर नहीं दिया और आनंद में निमग्न हुए चुपचाप बैठे रहे। अंत में कुछ स्वस्थ होने पर वे गदगद-कंठ से इस प्रकार बोले - "हे देवि! मैंने अभी स्वप्न में भगवान श्री महेश्वर का दर्शन किया है, उनकी ऐसी अपूर्व आनंदमय एवं मनोहर छवि थी कि देखते ही बनती थी। मालूम होता है, शंकर ने मुझे स्मरण किया है। अहोभाग्य! चलो, कैलाश में चलकर हमलोग महादेव के दर्शन करते है।

यह कहकर दोनों कैलाश की और चल दिए। मुश्किल से आधी दूर ही गये होंगे की देखते है भगवान शंकर स्वयं गिरिजा के साथ उनकी और आ रहे है, अब भगवान के आनंद का क्या ठिकाना? मानो घर बैठे निधि मिल गई। पास आते ही दोनों परस्पर बड़े प्रेम से मिले। मानो प्रेम और आनंद का समुन्द्र उमड़ पड़ा। एक दुसरे को देखकर दोनों के नेत्रों से आन्दाश्रू बहने लगे और शरीर पुलकायमान हो गया।undefined

दोनों ही एक दुसरे से लिपटे हुए कुछ देर मुक्वत खड़े रहे। प्रश्नोतर होनेपर मालूम हुए की शंकर जी ने भी रात्रि में इसी प्रकार का स्वप्न देखा मानो विष्णु भगवान को वे उसी रूप में देख रहे है। जिस रूप में वे अब उनके सामने खड़े थे। दोनों के स्वप्न का वृतांत अवगत होने पर दोनों ही लगे एक दुसरे से अपने यहाँ लिवा ले जाने का आग्रह करने। नारायण कहते वैकुण्ठ चलो और शम्भू कहते कैलाश की और प्रस्थान कीजिये। दोनों के आग्रह में इतना अलौकिक प्रेम था कि यह निर्णय करना कठिन हो गया कि कहाँ चला जाये?

इतने में ही क्या देखते है वीणा बजाते, हरिगुण गाते नारद जी कही से आ निकले। बस, फिर क्या था? दोनों ही उनसे निर्णय कराने लगे कि कहाँ चला जाये?

बेचारे नारद जी स्वयं परेशान थे उस अलौकिक मिलन को देखकर। वे तो स्वयं अपनी सुध-बुध भूल गये और लगे मस्त होकर दोनों का गुणगान करने। अब निर्णय कौन करे? अंत में यह तय हुई कि भगवती उमा जो कह दे वही ठीक है।

भगवती उमा पहले तो कुछ देर चुप रही। अंत में दोनों को लक्ष्य करके बोली, "हे नाथ! हे नारायण! आपलोगों के निश्छल, अनन्य एवम अलौकिक प्रेम को देखकर तो यही समझ में आता है कि आपके निवास-स्थान अलग-अलग नहीं है। जो कैलास है वही वैकुण्ठ है और जो वैकुण्ठ है वही कैलाश है। केवल नाम में ही भेद है। यही नहीं , मुझे तो ऐसा प्रतीत होता है कि आपकी आत्मा भी एक ही है। केवल शरीर देखने में दो है।

और तो और, मुझे तो अब यह स्पष्ट दिखने लगा ही आपके भार्याये भी एक ही है, दो नहीं। जो मै हूँ वही श्रीलक्ष्मी है। और जो श्रीलक्ष्मी है वही मै हूँ। केवल इतना ही नहीं, मेरी तो अब यह दृढ धारणा हो गई है कि आप लोगों में से एक के प्रति जो द्वेष करता है। वह मानो दुसरे के प्रति ही द्वेष करता है। एक की जो पूजा करता है। वह स्वाभाविक ही दुसरे कि भी करता है और जो एक को अपूज्य मानता है वह दुसरे कि भी पूजा नहीं करता। मै तो यह समझती हूँ , कि आप दोनों में जो भेद मानता है। उसका चिरकाल तक घोर पतन होता है। मै देखती हूँ कि, आप मुझे इस प्रसंग में अपना मध्यस्थ बनाकर मानो मेरी प्र्वच्चना कर रहे है। मुझे चक्कर में डाल रहे है। मुझे भुला रहे है। अब मेरी यह प्रार्थना है कि आपलोग दोनों ही अपने-अपने लोक को पधारिये। श्रीविष्णु यह समझे कि हम शिवरूप में से वैकुण्ठ जा रहे है और महेश्वर यह माने कि हम विष्णुरूप से कैलाश गमन कर रहे है।

इस उत्तर को सुनकर दोनों परम प्रसन्न हुए और भगवती उमा कि प्रशंसा करते हुए दोनों अपने अपने लोक को चले गये। लौटकर जब विष्णु वैकुण्ठ पहुंचे तो श्री लक्ष्मी जी उनसे पूछने लगी कि - 'प्रभु! सबसे अधिक प्रिय आपको कौन है? इस पर भगवान बोले - 'प्रिय! मेरे प्रियतम केवल श्री शंकर है। देहधारियो को अपने देह कि भांति वे मुझे अकारण ही प्रिय है। एक बार मै और शंकर दोनों ही पृथ्वी पर घुमने निकले। मै अपने प्रियतम की खोज में इस आशय से निकला कि मेरी ही तरह जो अपने प्रियतम की खोज में देश-देशांतर में भटक रहा होगा। वही मुझे अकारण प्रिय होगा। थोड़ी देर के बाद ही मेरी श्री शंकर जी से भेंट हो गई। ज्यो ही हम लोगों की चार आँखे हुई कि हमलोग पुर्वजन्मअर्जित विद्या कि भांति एक दुसरे कि प्रति आक्रष्ट हो गये, "वास्तव में मै ही जनार्दन हूँ। और मै ही महादेव हूँ।

अलग-अलग दो घडो में रखे हुए जल कि भांति मुझ में और उनमे कोई अंतर नहीं है। शंकरजी के अतिरिक्त शिवजी की अर्चना करने वाला शिवभक्त भी मुझे अत्यंत प्रिय है। इसके विपरीत जो शिव कि पूजा नहीं करते वे मुझे कदापि प्रिय नहीं हो सकते। शिव-द्रोही वैष्णवों को और विष्णु-द्वेषी शैवोको इस प्रसंग पर ध्यान देना चाहिए।

अब बोलो जय माता दी जी। फिर से बोले जय माता दी। हर हर महादेव। जय जय श्री कृष्णा। जय श्री नारायणा।

GOD's Unique Love with his Devoteeभगवान का अपने भक्त से अनोखा प्रेम

Dec 292017

एक राजा ने भगवान कृष्ण का एक मंदिर बनवाया और पूजा के लिए एक पुजारी को लगा दिया पुजारी बड़े भाव से बिहारीजी की सेवा करने लगे। भगवान की पूजा-अर्चना और सेवा-टहल करते पुजारी की उम्र बीत गई। राजा रोज एक फूलों की माला सेवक के हाथ से भेजा करता था। पुजारी वह माला बिहारी जी को पहना देते थे। जब राजा दर्शन करने आता तो पुजारी वह माला बिहारी जी के गले से उतारकर राजा को पहना देते थे। यह रोज का नियम था। एक दिन राजा किसी वजह से मंदिर नहीं जा सका।
उसने एक सेवक से कहा, "माला लेकर मंदिर जाओ। पुजारी से कहना, आज मैं नहीं आ पाउंगा"। सेवक ने जाकर माला पुजारी को दे दी और बता दिया कि आज महाराज का इंतजार न करें। सेवक वापस आ गया। पुजारी ने माला बिहारी जी को पहना दी। फिर उन्हें विचार आया कि आज तक मैं अपने बिहारी जी की चढ़ी माला राजा को ही पहनाता रहा। कभी ये सौभाग्य मुझे नहीं मिला। जीवन का कोई भरोसा नहीं कब रूठ जाए। आज मेरे प्रभु ने मुझ पर बड़ी कृपा की है। राजा आज आएंगे नहीं, तो क्यों न माला मैं पहन लूं। यह सोचकर पुजारी ने बिहारी जी के गले से माला उतारकर स्वयं पहन ली। इतने में सेवक आया और उसने बताया कि राजा की सवारी बस मंदिर में पहुंचने ही वाली है। यह सुनकर पुजारी कांप गए। उन्होंने सोचा अगर राजा ने माला मेरे गले में देख ली तो मुझ पर क्रोधित होंगे। इस भय से उन्होंने अपने गले से माला उतारकर बिहारीजी को फिर से पहना दी। जैसे ही राजा दर्शन को आया तो पुजारी ने नियम अुसार फिर से वह माला उतार कर राजा के गले में पहना दी। माला पहना रहे थे तभी राजा को माला में एक सफ़ेद बाल दिखा। राजा को सारा माजरा समझ गया कि पुजारी ने माला स्वयं पहन ली थी और फिर निकालकर वापस डाल दी होगी। पुजारी ऐसा छल करता है, यह सोचकर राजा को बहुत गुस्सा आया। उसने पुजारी जी से पूछा, "पुजारीजी यह सफ़ेद बाल किसका है"? पुजारी को लगा कि अगर सच बोलता हूं, तो राजा दंड दे देंगे इसलिए जान छुड़ाने के लिए पुजारी ने कहा, "महाराज यह सफ़ेद बाल तो बिहारीजी का है। अब तो राजा गुस्से से आग- बबूला हो गया कि ये पुजारी झूठ पर झूठ बोले जा रहा है। भला बिहारीजी के बाल भी कहीं सफ़ेद होते हैं।
राजा ने कहा, "पुजारी अगर यह सफेद बाल बिहारीजी का है तो सुबह शृंगार के समय मैं आउंगा और देखूंगा कि बिहारीजी के बाल सफ़ेद है या काले ? अगर बिहारीजी के बाल काले निकले तो आपको फांसी हो जाएगी। राजा हुक्म सुनाकर चला गया। अब पुजारी रोकर बिहारी जी से विनती करने लगे प्रभु मैं जानता हूं। आपके सम्मुख मैंने झूठ बोलने का अपराध किया। अपने गले में डाली माला पुनः आपको पहना दी। आपकी सेवा करते-करते वृद्ध हो गया। यह लालसा ही रही कि कभी आपको चढ़ी माला पहनने का सौभाग्य मिले। इसी लोभ में यह सब अपराध हुआ। मेरे ठाकुर जी पहली बार यह लोभ हुआ और ऐसी विपत्ति आ पड़ी है। मेरे नाथ अब नहीं होगा ऐसा अपराध। अब आप ही बचाइए नहीं तो कल सुबह मुझे फाँसी पर चढा दिया जाएगा।"
पुजारी सारी रात रोते रहे। सुबह होते ही राजा मंदिर में आ गया। उसने कहा कि आज प्रभु का शृंगार वह स्वयं करेगा। इतना कहकर राजा ने जैसे ही मुकुट हटाया तो हैरान रह गया। बिहारी जी के सारे बाल सफ़ेद थे। राजा को लगा, पुजारी ने जान बचाने के लिए बिहारीजी के बाल रंग दिए होंगे। गुस्से से तमतमाते हुए उसने बाल की जांच करनी चाही। बाल असली हैं या नकली यब समझने के लिए उसने जैसे ही बिहारी जी के बाल तोडे, बिहारीजी के सिर से खून की धार बहने लगी। राजा ने प्रभु के चरण पकड़ लिए और क्षमा मांगने लगा। बिहारीजी की मूर्ति से आवाज आई, "राजा तुमने आज तक मुझे केवल मूर्ति ही समझा इसलिए आज से मैं तुम्हारे लिए मूर्ति ही हूँ। पुजारीजी मुझे साक्षात भगवान् समझते हैं। उनकी श्रद्धा की लाज रखने के लिए आज मुझे अपने बाल सफेद करने पड़े व रक्त की धार भी बहानी पड़ी तुझे समझाने के लिए"।

कहते है "समझो तो देव नहीं तो पत्थर " श्रद्धा हो तो उन्हीं पत्थरों में भगवान सप्राण होकर भक्त से मिलने आ जाएंगे।
।। श्री वृन्दावन बांके बिहारी लाल की जय हो ।

How is GOD Realization कैसे हो भगवान की प्राप्ति

Dec 282017

श्री अयोध्या जी में एक उच्च कोटि के संत रहते थे, इन्हें रामायण का श्रवण करने का व्यसन था। जहाँ भी कथा चलती वहाँ बड़े प्रेम से कथा सुनते, कभी किसी प्रेमी अथवा संत से कथा कहने की विनती करते।
एक दिन राम कथा सुनाने वाला कोई मिला नहीं। वही पास से एक पंडित जी रामायण की पोथी लेकर जा रहे थे। पंडित जी ने संत को प्रणाम् किया और पूछा की महाराज ! क्या सेवा करे ? संत ने कहा - पंडित जी, रामायण की कथा सुना दो परंतु हमारे पास दक्षिणा देने के लिए रुपया नहीं है, हम तो फक्कड़ साधु है। माला, लंगोटी और कमंडल के अलावा कुछ है नहीं और कथा भी एकांत में सुनने का मन है हमारा।
पंडित जी ने कहा - ठीक है महाराज , संत और कथा सुनाने वाले पंडित जी दोनों सरयू जी के किनारे कुंजो में जा बैठे।
पंडित जी और संत रोज सही समय पर आकर वहाँ विराजते और कथा चलती रहती। संत बड़े प्रेम से कथा श्रवण करते थे और भाव विभोर होकर कभी नृत्य करने लगते तो कभी रोने लगते।undefined
जब कथा समाप्त हुई तब संत में पंडित जी से कहा - पंडित जी, आपने बहुत अच्छी कथा सुनायी। हम बहुत प्रसन्न है, हमारे पास दक्षिणा देने के लिए रूपया तो नहीं है परंतु आज आपको जो चाहिए वह आप मांगो।
संत सिद्ध कोटि के प्रेमी थे, श्री सीताराम जी उनसे संवाद भी किया करते थे। पंडित जी बोले - महाराज हम बहुत गरीब है, हमें बहुत सारा धन मिल जाये। संत बोले - संत ने प्रार्थना की की प्रभु इसे कृपा कर के धन दे दीजिये। भगवान् ने मुस्कुरा दिया, संत बोले - तथास्तु। फिर संत ने पूछा - मांगो और क्या चाहते हो ? पंडित जी बोले - हमारे घर पुत्र का जन्म हो जाए। संत ने पुनः प्रार्थना की और श्रीराम जी मुस्कुरा दिए। संत बोले - तथास्तु, तुम्हें बहुत अच्छा ज्ञानी पुत्र होगा।
फिर संत बोले और कुछ माँगना है तो मांग लो । पंडित जी बोले - श्री सीताराम जी की अखंड भक्ति, प्रेम हमें प्राप्त हो । संत बोले - *नहीं ! यह नहीं मिलेगा।*
पंडित जी आश्चर्य में पड़ गए की महात्मा क्या बोल गए। पंडित जी ने पूछा - संत भगवान् ! यह बात समझ नहीं आयी। संत बोले - तुम्हारे मन में प्रथम प्राथमिकता धन, सम्मान, घर की है। दूसरी प्राथमिकता पुत्र की है और अंतिम प्राथमिकता भगवान् के भक्ति की है। जब तक हम संसार को, परिवार, धन, पुत्र आदि को प्राथमिकता देते है तब तक भक्ति नहीं मिलती।
भगवान् ने जब केवट से पूछा की तुम्हें क्या चाहिए ? केवट ने कुछ नहीं माँगा।
प्रभु ने पूछा - तुम्हें बहुत सा धन देते है, केवट बोला नहीं। प्रभु ने कहा - ध्रुव पद ले लो, केवट बोला - नहीं । इंद्र पद, पृथ्वी का राजा, और मोक्ष तक देने की बात की परंतु केवट ने कुछ नहीं लिया तब जाकर प्रभु ने उसे भक्ति प्रदान की।
हनुमान जी को जानकी माता ने अनेको वरदान दिए - बल, बुद्धि , सिद्धि, अमरत्व आदि परंतु उन्होंने कुछ प्रसन्नता नहीं दिखाई। अंत में जानकी जी ने श्री राम जी का प्रेम, अखंड भक्ति का वर दिया।
प्रह्लाद जी ने भी कहा की *हमारे मन में मांगने की कभी कोई इच्छा ही न उत्पन्न हो तब भगवान् ने अखंड भक्ति प्रदान की।

We ask right or God give right?

Dec 172017

एक बच्चा अपनी मां के साथ एक दुकान में गया। दुकान में तरह-तरह की टॉफियां भिन्न-भिन्न जारों में सजी हुई थीं। बच्चा टॉफियों को देखकर लालायित हो उठा। बच्चे की भोली आंखों पर दुकानदार मोहित हो गया। वह बच्चे से बोला, तू कोई भी टॉफी ले ले। दुकानदार की बात सुनकर बच्चे ने दुकानदार से कहा, मुझे नहीं चाहिए। दुकानदार ने बच्चे को हैरानी से देखा और कहा, तू कोई भी टॉफी ले ले, मैं पैसे नहीं लूंगा। बच्चे की मां ने भी उससे कहा, बेटे, तू कोई भी टॉफी ले ले। बच्चे ने फिर मना कर दिया। मां और दुकानदार हैरान हो गए।

तभी दुकानदार ने स्वयं जार में हाथ डाला और बच्चे की तरफ मुट्ठी बढ़ाई। बच्चे ने झट से अपने स्कूल के बस्ते में टॉफियां डलवा लीं। दुकान से बाहर आने पर मां ने बच्चे से कहा, जब तुझे टॉफियां लेने को कहा गया, तो मना कर दिया और जब दुकानदार ने टॉफियां दीं तो इतनी सारी ले लीं। बच्चे ने मां से कहा, मां, मेरी मुट्ठी बहुत ही छोटी है, परंतु दुकानदार की मुट्ठी बहुत बड़ी है। मैं लेता तो कम मिलतीं।

यही हाल हमारा है। हमारी मुट्ठी बहुत छोटी है और प्रभु की बहुत बड़ी। इसी तरह हमारी सोच बहुत छोटी है और प्रभु की बहुत बड़ी। अर्थात प्रभु ने हमें जो भी दिया है, वह हमारी सोच से कहीं ज्यादा है। आज से 25 वर्ष पहले यदि आपको वस्तुओं के लिए इच्छाओं की सूची बनाने को बोला जाता, तो शायद वह आज के संदर्भ में बहुत छोटी होती। आज हमें प्रभु ने या प्रकृति ने इतना कुछ दिया है, जो हमारी सोच से भी बड़ा है। इसलिए प्रभु की सोच हमारे लिए विशाल और व्यापक है।undefined

श्रीमद्भगवत गीता के मध्य के श्लोक में श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं-अनन्यातियांतो मार्य जना: पर्युपासते। तेषा नित्याभियुक्ताना योगक्षेम वहाम्यत्म..। अर्थात जो अनन्य भाव से मेरा निरंतर चिंतन करते हुए भजते हैं, उनको योग, क्षेम (सांसारिक और आध्यात्मिक सुख) मैं स्वयं ही प्राप्त करवा देता हूं।

इस बात को समझना होगा। भजना सजा नहीं है, बल्कि मजा है। यह बात मात्र प्रभु के विषय में ही नहीं, अपितु हर वस्तु और विषय पर लागू होती है। आप जिस भी वस्तु या विषय को भजें, उसे पूर्णता से भजें। अर्थात जो भी कार्य करें, उसे पूर्णता से करें। भजना अर्थात उसे जीवन में अंगीकार करना। भजना अर्थात आपके और उस वस्तु विषय में कोई भी अंतर न रहे।

किसी व्यक्ति के मन में यह सोच आ सकती है कि कहीं आध्यात्म में आने के बाद यह जीवन का सफर फटे बादल की तरह व्यर्थ तो नहीं हो जाएगा? इस विचार का तोड़ भगवान स्वयं गीता में कहते हैं- जो भी व्यक्ति अपने जीवन में श्रेष्ठ नियमों को अपनाता है, उसकी कभी दुर्गति नहीं होती।

हम अपने कर्म पूरी दक्षता से करें तथा कर्म के फल को प्रभु को अर्पण कर दें। उस सोच को कभी न भूलें कि हमारी मुट्ठी बहुत छोटी है और प्रभु की मुट्ठी बहुत बड़ी है।

What is prayer - क्या है प्रार्थना

Dec 162017

दुआ बहार की मांगी तो इतने फूल खिले

कहीं जगह न मिली मेरे आशियाने को..।


मैँ हूं दुआ.. प्रार्थना.. प्रेयर..। मुझे जिसने अपने मन में बसाया, अपने सफर का साथी बनाया, मैं उसका साया बन गई। मैंने उसकी जिंदगी में तमाम फूल खिला दिए। मेरे चाहने वालों ने मुझे अपने कंठ में माला की तरह धारण कर लिया। किसी योगी की तरह।

इंसान ने जब से पंच-तत्वों की शक्ति को पहचाना, तभी से मेरा जन्म हुआ। प्रकृति के कोप से सुरक्षा के लिए हाथ उठे। आग, हवा, पानी का कहर थमा तो इंसान की आस्था बढ़ी कि जरूर कोई शक्ति है, जो सब कुछ नियंत्रित करती है। उसके ही अधीन सब हैं। मुझे नहीं मालूम कि वह शक्ति कहां है, कैसी है। वह निराकार है या साकार। मगर मैं इतना जरूर जानती हूं कि जिसने भी दिल से एक बार भगवान के आगे हाथ जोड़े, रब से खैर मांगी, उसकी जिंदगी में बदलाव की बयार बहने लगी। विज्ञान भी मेरी शक्ति को कुबूल कर चुका है। प्रयोगों में यह साबित हुआ कि प्रार्थना से एक नई सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। बताती हूं कि आखिर मैं कैसे बुरे हालात में इंसान के काम आती हूं?

असल में जब भी कोई प्रार्थना के लिए हाथ उठाता या जोड़ता है या अपना शीश नवाता है, मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे, गिरजाघर या देवता के सामने ध्यान लगाकर दुखों से छुटकारे की कामना करता है, वह एक तरीके से खुद को ही अंदरूनी तौर पर हालात से निपटने के लिए तैयार करता है। मेरी वजह से उसके अंदर एक विश्वास पैदा होने लगता है। उसे लगता है कि अब उसकी जिंदगी से विपत्तियां टल जाएंगी। उसका अच्छा वक्त शुरू हो जाएगा। ऐसा सोचते ही उसे अपने भीतर एक नई आध्यात्मिक शक्ति आत्मबल का अहसास होता है। यह सकारात्मक भावना उसमें वक्त और हालात से लड़ने की नई शक्ति देती है और वह संयम और धैर्य से बिगड़े हालात से लोहा लेने चल पड़ता है। जिंदगी के संघर्ष में हौसले से कूद पड़ता है। मैं यह तो नहीं कह सकती कि प्रार्थना करने वाले को अदृश्य शक्ति से कोई मदद मिलती है या नहीं, लेकिन उसमें जो परिवर्तन आता है, वह उसे जिंदगी की जंग के लिए तैयार कर देता है। किसी ने कहा है :

कश्ती रवां-गवां है इशारा है नाखुदा

तूफान में कश्ती का सहारा है नाखुदाundefined

अर्थात कश्ती अगर तूफान के भंवर में फंस जाती है, तो एकमात्र सहारा मल्लाह ही होता है। असल में हमारी जिंदगी हालात के भंवर में हिचकोले खाती एक कश्ती (नाव) ही तो है, जिसके नाखुदा (मल्लाह) हम ही हैं। हौसला है तो हम लहरों से पार पा जाते हैं। भंवर से निकल जाते हैं, लेकिन हममें साहस नहीं तो फिर डूबना तय है। मैं साहस देकर डूबने से बचाती हूं।

कोई मंगलवार को हनुमान के दर्शन को जाता है, कोई गुरुवार को खानाख्वाहों में मत्था टेकता है, कोई रविवार को चर्च में प्रभु के आगे प्रेयर कर सुकून पाता है। बेशक मेरे तरीके हर धर्म-संप्रदाय में अलग-अलग हैं, मगर मेरा फलसफा बस एक ही है- भले की कामना।

प्रार्थना अपने लिए ही नहीं, दूसरों के लिए भी होती है। प्रार्थना सार्वभौमिक है। संपूर्ण सृष्टि के लिए है। जापान की सुनामी के लिए हमारे देश और दुनिया में कितनी प्रार्थना सभाएं हुईं। मदद देने के साथ मेरा भी सहारा लिया गया। सच तो यह है कि इंसानों की भी अपनी सीमा है। कितने लोग ऐसे हैं, जो बुरे हालात में भले ही किसी की मदद न कर सकते हों, लेकिन मेरी शरण में आकर उनके अच्छे की कामना तो कर ही सकते हैं। जीवन की हर परीक्षा में मैं अपने चाहने वालों के साथ रहती हूं।

प्रभु ईसा मसीह के अनुयायी मेरी चंगाई सभाओं में भी बहुत विश्वास रखते हैं। चंगाई सभा में मंच से फादर प्रभु के आज्जन की प्रार्थना करते हैं। ऐसी सभाओं में चलने-फिरने में असमर्थ लोग चलने-फिरने लायक होने का दावा करते हैं। पलों में प्रार्थना से घटने वाला यह चमत्कार लोगों की मुझमें आस्था तो बढ़ाता ही है, उन्हें अभिभूत भी कर देता है। चंगे होकर लोग घर लौटते हैं और मेरे महत्व की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हैं।

आज दुनिया में कितने लोग हैं, जिन्हें फरिश्तों की तरह माना जाता है। दरअसल, जिन लोगों ने अपना पूरा जीवन मानवता की सेवा और प्रभु की प्रार्थना में लगा दिया, उनकी दुआ जरूर कुबूल होती है। वे चाहे जिसके लिए भी मेरी मदद लें। मेरे जरिये मदद के लिए इंसान का नेक अमल होना जरूरी है। उसके इरादे और नीयत साफ होनी चाहिए। अगर किसी के बुरे के लिए इंसान हाथ उठाएगा, तो वह दुआ कहां होगी? वह तो बद्दुआ बन जाएगी। मैं पाखंडी, स्वार्थी और दूसरों का बुरा चाहने वालों को स्वीकार नहीं करती।

कहते हैं कि जब कुछ नहीं होता तो सिर्फ प्रार्थना होती है। कितनी बार इंसान ऐसे हालात में घिर जाता है, जहां मदद भी काम नहीं आती। तब मैं ही काम आती हूं। बड़े से बड़ा डॉक्टर भी जब किसी का इलाज करके हार जाता है, तो वह भी कहता है कि अब दवा के साथ दुआ की भी जरूरत है। इस्लाम में कहा गया है कि जब तक सांस चल रही है, इंसान अपने गुनाहों की माफी दुआ से मांग सकता है, मगर दुनिया से जाने के बाद व्यक्ति न तो दुआ कर सकता है न ही अपने गुनाहों की माफी मांग सकता है। उसकी आत्मा की शांति के लिए दूसरे लोग ही प्रार्थना कर सकते हैं।

भले ही अलग-अलग धर्मो में प्रार्थना के लिए अलग तरीका बताया गया हो, मगर सबका सार यही है कि हे प्रभु, अब तू ही मुझे हालात से निपटने की शक्ति देगा। मैं यही कहती हूं कि बस अच्छा सोचो, अच्छा करो और आगे बढ़ो। हालात से निराश मत हो। सकारात्मक रहो।

प्रथम पूज्य गणेश

Dec 152017

प्राचीन समय में सुमेरू पर्वत पर सौभरि ऋषि का अत्यंत मनमोहक आश्रम था। उनकी अत्यंत पतिव्रता और रूपवती पत्नी का नाम मनोमयी था। एक दिन ऋषि लकड़ी लेने के लिए वन में गए और मनोमयी गृह-कार्य में लग गई। उसी समय एक दुष्ट कौंच नामक गंधर्व वहाँ आया और उसने अनुपम लावण्यवती मनोमयी को देखकर तो व्याकुल हो गया।

कौंच ने ऋषि-पत्नी का हाथ पकड़ लिया। रोती और काँपती हुई ऋषि पत्नी उससे दया की भीख माँगने लगी। उसी समय सौभरि ऋषि आ गए। उन्होंने गंधर्व को श्राप देते हुए कहा "तूने चोर की तरह मेरी सहधर्मिणी का हाथ पकड़ा है, इसके कारण तू मूषक होकर धरती के नीचे और चोरी करके अपना पेट भरेगा।"

काँपते हुए गंधर्व ने मुनि से प्रार्थना की-"दयालु मुनि, अविवेक के कारण मैंने आपकी पत्नी के हाथ का स्पर्श किया था। मुझे क्षमा कर दें।"undefined

ऋषि ने कहा, "मेरा श्राप व्यर्थ नहीं होगा, तथापि द्वापर में महर्षि पराशर के यहाँ गणपति देव गजमुख पुत्र रूप में प्रकट होंगे (हर युग में गणेशजी ने अलग-अलग अवतार लिए) तब तू उनका वाहन बन जाएगा, जिससे देवगण भी तुम्हारा सम्मान करने लगेंगे।"

गणेश को जन्म न देते हुए माता पार्वती ने उनके शरीर की रचना की। उस समय उनका मुख सामान्य था। माता पार्वती के स्नानागार में गणेश की रचना के बाद माता ने उनको घर की पहरेदारी करने का आदेश दिया।

माता ने कहा, "कि जब तक वह स्नान कर रही हैं तब तक के लिये गणेश किसी को भी घर में प्रवेश न करने दे।" तभी द्वार पर भगवान शंकर आए और बोले "पुत्र यह मेरा घर है मुझे प्रवेश करने दो।"

गणेश के रोकने पर प्रभु ने गणेश का सर धड़ से अलग कर दिया। गणेश को भूमि में निर्जीव पड़ा देख माता पार्वती व्याकुल हो उठीं। तब शिव को उनकी त्रुटि का बोध हुआ और उन्होंने गणेश के धड़ पर गज का सर लगा दिया। उनको प्रथम पूज्य का वरदान मिला इसीलिए सर्वप्रथम गणेश की पूजा होती है।

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