Lovedeep Kapila

Hello World

Means of Donation दान का मतलब

Jan 272018

दान में महत्व है त्याग का, वस्तु के मूल्य या संख्या का नहीं | ऐसी त्याग बुद्धि से जो सुपात्र को यानि जिस वस्तु का जिसके पास अभाव है, उसे वह वस्तु देना और उसमें किसी भी प्रकार की कामना न रखना, उत्तम दान है | निष्काम भाव से किसी भूखे को भोजन और प्यासे को जल देना सात्विक दान है |undefined

संत एकनाथ जी की कथा आती है | की वह एक समय प्रयाग से कांवर पर जल लेकर श्रीरामेश्ह्वर चढ़ाने के लिए जा रहे थे | रास्ते में जब एक जगह उन्होंने देखा कि एक गधा प्यास के कारण पानी के बिना तड़प रहा है, तो उसे देखकर उन्हें दया आ गयी और उन्होनें उसे थोडा-सा जल पिलाया, इससे उसे कुछ चेत-सा आया | फिर उन्होनें थोडा-थोडा करके सारा जल उसे पिला दिया | वह गधा उठकर चला गया | साथियों ने सोचा कि त्रिवेणी का जल व्यर्थ हो गया और यात्रा भी निष्फल हो गयी |
तब एकनाथ जी ने हंसकर कहा, " भाइयों, बार बार सुनते हो कि भगबान सब प्राणियों के अंदर हैं, फिर भी ऐसे बावलेपन कि बातें सोचते हो | मेरी पूजा तो यहीं से श्रीरामेश्वर को पहुँच गई | भगवान शंकर ने मेरे जल को स्वीकार कर लिया |

Get rid of cycles of Life and Death जीवन मृत्यु के चक्र से छुटकारा

Jan 172018

शास्त्रों के अनुसार जन्म और मृत्यु एक चक्र है तो अनवरत चलता रहता है। आत्मा वस्त्रों की तरह शरीर बदलती रहती है। आत्मा अमर है और वह निश्चित समय के लिए अलग-अलग शरीर धारण करती है। प्राणी के जीवन और मृत्यु के इस चक्र से मुक्ति को मोक्ष कहा जाता है।

आचार्य चाणक्य ने 5 बातें बताई हैं, जो इंसान जीवन में इन बातों का ध्यान रखता है उसे मोक्ष प्राप्त हो जाता है-undefined


आचार्य चाणक्य कहते हैं कि :-- "वचनशुद्धि मनशुद्धि औ, इन्द्रिय संयम शुद्धि। भूत दया औ स्वच्छता, पर अर्थिन यह बुद्धि।।"


आचार्य चाणक्य ने इस दौहे में बताया है कि जो लोग अपनी वाणी में पवित्रता बनाए रखते हैं, कभी भी किसी के मन को ठेस नहीं पहुंचाते हैं, हमेशा मीठा बोलते हैं, उन्हें मोक्ष प्राप्त होता है।

जो लोग मन से शुद्ध होते हैं, किसी का अहित नहीं सोचते हैं उन्हें मोक्ष प्राप्त होता है।

जो लोग इंद्रियों पर संयम रखते हैं और व्यर्थ की बातों में ध्यान नहीं देते हैं उन्हें बार-बार जन्म-मृत्यु के चक्र में फंसना नहीं पड़ता है।

सभी जीवों और प्राणियों से प्रेम करना, सभी का ध्यान रखना, किसी को नुकसान नहीं पहुंचाना ये गुण वाले व्यक्ति को मोक्ष प्राप्त होता है।

जो लोग अपने धन की दूसरों की मदद में खर्च करते हैं, जो धन को व्यर्थ खर्च नहीं करते हैं, जो लोग धर्म के कार्यों में धन लगाते हैं उन्हें मोक्ष प्राप्त होता है।

How to save a relationship रिश्ते को कैसे बचाएंगे

Jan 082018

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एक सहेली ने दूसरी सहेली से पूछा:- बच्चा पैदा होने की खुशी में तुम्हारे पति ने तुम्हें क्या तोहफा दिया ?
सहेली ने कहा - कुछ भी नहीं!
उसने सवाल करते हुए पूछा कि क्या ये अच्छी बात है ? क्या उस की नज़र में तुम्हारी कोई कीमत नहीं ?
लफ्ज़ों का ये ज़हरीला बम गिरा कर वह सहेली दूसरी सहेली को अपनी फिक्र में छोड़कर चलती बनी।।
थोड़ी देर बाद शाम के वक्त उसका पति घर आया और पत्नी का मुंह लटका हुआ पाया।। फिर दोनों में झगड़ा हुआ।।
एक दूसरे को लानतें भेजी।। मारपीट हुई, और आखिर पति पत्नी में तलाक हो गया।।

जानते हैं प्रॉब्लम की शुरुआत कहां से हुई ? उस फिजूल जुमले से जो उसका हालचाल जानने आई सहेली ने कहा था।।

रवि ने अपने जिगरी दोस्त पवन से पूछा:- तुम कहां काम करते हो?
पवन- फला दुकान में।। रवि- कितनी तनख्वाह देता है मालिक?
पवन-18 हजार।।
रवि-18000 रुपये बस, तुम्हारी जिंदगी कैसे कटती है इतने पैसों में ? undefined
पवन- (गहरी सांस खींचते हुए)- बस यार क्या बताऊं।।
मीटिंग खत्म हुई, कुछ दिनों के बाद पवन अब अपने काम से बेरूखा हो गया।। और तनख्वाह बढ़ाने की डिमांड कर दी।। जिसे मालिक ने रद्द कर दिया।। पवन ने जॉब छोड़ दी और बेरोजगार हो गया।। पहले उसके पास काम था अब काम नहीं रहा।।

एक साहब ने एक शख्स से कहा जो अपने बेटे से अलग रहता था।। तुम्हारा बेटा तुमसे बहुत कम मिलने आता है।। क्या उसे तुमसे मोहब्बत नहीं रही? बाप ने कहा बेटा ज्यादा व्यस्त रहता है, उसका काम का शेड्यूल बहुत सख्त है।। उसके बीवी बच्चे हैं, उसे बहुत कम वक्त मिलता है।।
पहला आदमी बोला- वाह!! यह क्या बात हुई, तुमने उसे पाला-पोसा उसकी हर ख्वाहिश पूरी की, अब उसको बुढ़ापे में व्यस्तता की वजह से मिलने का वक्त नहीं मिलता है।। तो यह ना मिलने का बहाना है।।
इस बातचीत के बाद बाप के दिल में बेटे के प्रति शंका पैदा हो गई।। बेटा जब भी मिलने आता वो ये ही सोचता रहता कि उसके पास सबके लिए वक्त है सिवाय मेरे।।

याद रखिए जुबान से निकले शब्द दूसरे पर बड़ा गहरा असर डाल देते हैं।। बेशक कुछ लोगों की जुबानों से शैतानी बोल निकलते हैं।। हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में बहुत से सवाल हमें बहुत मासूम लगते हैं।। जैसे-
तुमने यह क्यों नहीं खरीदा।।
तुम्हारे पास यह क्यों नहीं है।।
तुम इस शख्स के साथ पूरी जिंदगी कैसे चल सकती हो।।
तुम उसे कैसे मान सकते हो।। वगैरा वगैरा।।

इस तरह के बेमतलबी फिजूल के सवाल नादानी में या बिना मकसद के हम पूछ बैठते हैं।।
जबकि हम यह भूल जाते हैं कि हमारे ये सवाल सुनने वाले के दिल में नफरत या मोहब्बत का कौन सा बीज बो रहे हैं।।

आज के दौर में हमारे इर्द-गिर्द, समाज या घरों में जो टेंशन टाइट होती जा रही है, उनकी जड़ तक जाया जाए तो अक्सर उसके पीछे किसी और का हाथ होता है।। वो ये नहीं जानते कि नादानी में या जानबूझकर बोले जाने वाले जुमले किसी की ज़िंदगी को तबाह कर सकते हैं।।
ऐसी हवा फैलाने वाले हम ना बनें।। लोगों के घरों में अंधे बनकर जाओ और वहां से गूंगे बनकर निकलो।

एक बार विचार जरूर करो
किसी के कहने पर जिऩ्दगी को ख़राब होने से बचाए ।

God’s Perfect Plan

Jan 042018

एक बार भगवान से उनका सेवक कहता है,
भगवान, "आप एक जगह खड़े-खड़े थक गये होंगे, एक दिन के लिए मैं आपकी जगह मूर्ति बनकर खड़ा हो जाता हूं l आप मेरा रूप धारण कर घूम आओ l
भगवान मान जाते हैं, लेकिन शर्त रखते हैं कि, जो भी लोग प्रार्थना करने आयें, तुम बस उनकी प्रार्थना सुन लेना कुछ बोलना नहीं l मैंने उन सभी के लिए प्लानिंग कर रखी है l
सेवक मान जाता है l

सबसे पहले मंदिर में Businessman आता है और कहता है, "भगवान मैंने एक नयी फैक्ट्री डाली है l उसे खूब सफल करना" l वह माथा टेकता है, तो उसका पर्स नीचे
गिर जाता है l वह बिना पर्स लिये ही चला जाता है l सेवक बेचैन हो जाता है. वह सोचता है, कि रोककर उसे बताये कि पर्स गिर गया, लेकिन शर्त की वजह से वह नहीं कह पाता l

इसके बाद एक गरीब आदमी आता है और भगवान को कहता है कि घर में खाने को कुछ नहीं l भगवान मदद करो l तभी उसकी नजर पर्स पर पड़ती है l वह भगवान का शुक्रिया
अदा करता है और पर्स लेकर चला जाता है l

अब तीसरा व्यक्ति आता है, वह नाविक होता है l वह भगवान से कहता है कि, "मैं 15 दिनों के लिए जहाज लेकर समुद्र की यात्रा पर जा रहा हूं l यात्रा में कोई अड़चन न आये भगवान..

तभी पीछे से Businessman पुलिस के साथ आता है और कहता है कि मेरे बाद ये नाविक आया है l इसी ने मेरा पर्स चुरा लिया है, पुलिस नाविक को ले जा रही होती है,
तभी सेवक बोल पड़ता है lundefined

अब पुलिस सेवक के कहने पर उस गरीब आदमी को पकड़ कर जेल में बंद कर देती है l Businessman रात को भगवान आते हैं, तो सेवक खुशी खुशी पूरा किस्सा बताता है l

भगवान कहते हैं, तुमने किसी का काम बनाया नहीं, बल्कि बिगाड़ा है l

वह व्यापारी गलत धंधे करता है,अगर उसका पर्स गिर भी गया, तो उसे फर्क नहीं पड़ता था l इससे उसके पाप ही कम होते, क्योंकि वह पर्स गरीब इंसान को मिला था l पर्स
मिलने पर उसके बच्चे भूखों नहीं मरते l रही बात नाविक की, तो वह जिस यात्रा पर जा रहा था, वहां तूफान आनेवाला था l अगर वह जेल में रहता, तो जान बच जाती l उसकी
पत्नी विधवा होने से बच जाती l तुमने सब गड़बड़ कर दी l

कई बार हमारी लाइफ में भी ऐसी Problems आती है, जब हमें लगता है कि ये मेरे साथ ही क्यों हुआ l लेकिन इसके पीछे भगवान की Planing होती है l जब भी कोई

प्रॉब्लमन आये l उदास मत होना l इस कहानी को याद करना और सोचना कि जो भी होता है,i अच्छे के लिए होता है ll 

Responsibility

Dec 162017

उत्तरदायित्व सदैव ही स्वतंत्रता का सबसे पहला कदम है। किसी दूसरे के कंधों पर उत्तरदायित्व डाल देना, स्वतंत्रता के अवसर को चूक जाना है। गंवा देना है। उत्तरदायित्व और स्वतंत्रता को अलग-अलग नहीं किया जा सकता। वे अविभाज्य रूप से एक हैं।

यह सच है कि संपूर्ण उत्तरदायित्व शिष्य का ही है। गुरु तो केवल एक उत्प्रेरक या एक बहाना ही है। परंतु उत्तरदायित्व को स्वीकार करना हिम्मत का काम है। स्वतंत्रता तो हर कोई चाहता है, पर उत्तरदायित्व कोई भी नहीं लेना चाहता। लेकिन समस्या यह है कि स्वतंत्रता और उत्तरदायित्व साथ-साथ रहते हैं। यदि तुम उत्तरदायित्व नहीं चाहते, तो किसी न किसी रूप में गुलाम जरूर बना लिए जाओगे।

यह गुलामी आध्यात्मिक भी हो सकती है, जो संभवत: सबसे बुरी गुलामी है। राजनैतिक, आर्थिक गुलामी तो ऊपरी हैं, बनावटी हैं। तुम उनके खिलाफ आसानी से विद्रोह कर सकते हो। लेकिन आध्यात्मिक गुलामी इतनी गहरी है कि उसके खिलाफ विद्रोह करने का खयाल ही नहीं आता। सीधा-सा कारण यह है कि यह गुलामी है ही इसलिए, क्योंकि तुमने इसे स्वयं चाहा है।

स्वयं मांगा है। दूसरी गुलामियां तुम्हारे ऊपर लादी जाती हैं। उन्हें तुम उतारकर फेंक सकते हो, लेकिन आध्यात्मिक गुलामी तुम्हें इच्छा के विपरीत नहीं लगती। यह एक बड़ी सांत्वना मालूम पड़ती है। यह सांत्वना कि तुम्हारे उत्तरदायित्व किसी ऐसे व्यक्ति ने अपने ऊपर ले लिया है, जो जानता है कि अब तुम्हें चिंता करने की आवश्यकता नहीं है। लेकिन स्मरण रहे, उत्तरदायित्व के साथ-साथ तुमने स्वतंत्रता भी गंवा दी, क्योंकि तुमने उससे अपेक्षा कर ली।undefined

अपेक्षा एक बंधन है। देर-सबेर यह निराशा में ले जाती है। गुरु-शिष्य का संबंध आशा-अपेक्षाओं का संबंध नहीं है। लेकिन तुम्हारा जीवन अपेक्षाओं से भरा हुआ है। इसीलिए जब तुम गुरु के पास भी आते हो, तब भी तुम्हारा मन अपेक्षाएं लगा लेता है। यदि कोई गुरु तुम्हारी अपेक्षाएं पूरी करने को तैयार है, तो वह गुरु नहीं है। वह केवल तुम्हारा शोषण कर रहा है।

कोई सद्गुरु यह नहीं कहता कि मैं तुम्हारी अपेक्षाएं पूरी करूंगा। वह केवल इतना ही कह सकता है कि मैं तुम्हारी सभी अपेक्षाएं नष्ट कर दूंगा, क्योंकि इसके बिना तुम्हारा पुराना, सड़ा-गला मन नष्ट नहीं किया जा सकता। तुम्हारी पुरानी आदतें तुम्हारी चेतना अस्तित्व के विकास में बाधक हैं, दूर नहीं की जा सकतीं।

प्रामाणिक गुरु अपने ऊपर उत्तरदायित्व नहीं लेता। सच तो यह है कि सिर्फ मिथ्या गुरु ज्यादा ही अवतार या पैगंबर, एक रक्षक, एक मसीहा, एक संदेशवाहक होने के खयाल का मजा ले सकता है। केवल वही है, जो तुम्हारी कमजोरियों का लाभ उठा रहा है। वह तुमसे कह सकता है कि बस मुझ पर विश्वास करो और तुम बचा लिए जाओगे। तुम्हें यह बड़ा सस्ता और सरल लगता है।

मनुष्यता की शुरुआत से ही ऐसे लोग रहे हैं, जो आदमी की कमजोरियों का फायदा उठाते रहे हैं। आदमी की सबसे बड़ी कमजोरियों में एक यह है कि वह मुफ्त में ही सब कुछ पाना चाहता है। यदि ईश्वर के अस्तित्व का विश्वास करने से ही स्वर्ग मिल जाए और यदि रक्षक सच में हो बचाने वाला, तब तुम खो कुछ नहीं रहे हो, सिर्फ पा रहे हो। तुम्हें भले ही न मिले, लेकिन मिलने की आशा में तो रहोगे। धार्मिक लोग तो तुम्हें आशा देते रहे हैं।

कार्ल मा‌र्क्स कहा करते थे कि धर्म भीड़ के लिए अफीम का नशा है, पर वह इस तथ्य के गहन विश्लेषण में कभी नहीं गए। क्या है अफीम? आशा अफीम है। वे तुम्हें आशा देते हैं। वे तुम्हें कुछ नहीं के बदले सब कुछ देने को तैयार हैं। बस विश्वास करो, सारा उत्तरदायित्व उन्हें सौंप दो। और तुम इस बात के लिए सजग नहीं हो कि जिस क्षण तुमने अपना उत्तरदायित्व उन्हें सौंपा, तुमने अपनी स्वतंत्रता भी उन्हें दे दी।

उनकी रुचि, उनकी उत्सुकता केवल तुम्हारी स्वतंत्रता में है। स्वतंत्रता की बात वे तुमसे नहीं करते। वे तुमसे यह नहीं कहते, अपनी स्वतंत्रता हमें दे दो, क्योंकि कोई अपनी स्वतंत्रता उन्हें नहीं देगा। वे कहते हैं, अपना उत्तरदायित्व हमें दे दो, क्योंकि लोगों को अपना उत्तरदायित्व बोझ मालूम पड़ता है। लेकिन इस तथ्य के प्रति तुम जागरूक नहीं हो कि उत्तरदायित्व के साथ-साथ ही तुम्हारी स्वतंत्रता भी खो जाती है। तुम एक गुलाम बन जाते हो।

संपूर्ण मनुष्य-जाति अलग-अलग तरह के लोगों द्वारा गुलाम बना ली गई है, पर गुलामी एक ही है। एक प्रामाणिक गुरु, एक सच्चा गुरु अपने ऊपर कोई उत्तरदायित्व नहीं लेता। यही कारण है कि सद्गुरु के पास कभी भी बहुत अधिक अनुयायी नहीं होते। क्योंकि कौन ऐसे आदमी का अनुगमन करेगा, जो उत्तरदायित्व लेने को तैयार न हो।

जो तुम्हें कोई अफीम या आशा नहीं देता। इसके विपरीत वह तुम्हारी सभी आशाएं, तुम्हारे सभी नशे छीन लेता है और जितना हो सके तुम्हें स्वच्छ, पवित्र, निर्दोष, शून्य और खाली बनाने का प्रयत्न करता है। जबकि वास्तविक गुरु ही तुम्हें स्वतंत्रता देता है। उसकी पूरी कोशिश तुम्हें पूर्ण रूप से स्वतंत्र बनाने की होगी। लेकिन तुम स्वतंत्रता से भयभीत हो।

जरा अपने मन के काम करने का ढंग देखो। क्या तुम स्वतंत्रता नहीं चाहते? यदि तुम अपने गहरे भीतर झांको, तो तुम अपने भय देख सकोगे। तुम स्वतंत्रता से भयभीत हो, क्योंकि स्वतंत्र होने का तात्पर्य है कि तुम्हें अकेले अपने पैरों पर खड़ा होना होगा। और लोग अकेले होने से बहुत भयभीत हैं। वे सोचते हैं कि काश, यदि वे दो होते तो..।

भीड़ के साथ हो जाने का मतलब यह नहीं है कि अकेलापन चला गया। जब तुम अपना उत्तरदायित्व किसी को सौंपते हो, तो सोचते हो कि अब तुम्हारा उत्तरदायित्व समाप्त हो गया। यह संभव नहीं। तुम्हें ही उत्तरदायी होना है। बिना उत्तरदायित्व के तुम हो ही नहीं। केवल मृत लोगों पर कोई उत्तरदायित्व नहीं होता।

यह याद रखो कि तुम जितने अधिक जीवंत होते हो, उतने अधिक उत्तरदायी होते हो। और जितने अधिक जीवंत होगे, उतनी ही अधिक स्वतंत्रता की आवश्यकता होगी- काम करने के लिए, सृजन के लिए, अपने होने के लिए।

If you want a pleasant change in life

Dec 152017

 

एक दार्शनिक व्याख्यान लिख रहे थे। हाथ में पेंसिल लेकर चिंतन में मग्न थे। तभी उनका शिष्य आ गया। बोला- मैं जीवन में बड़ा परिवर्तन चाहता हूं.. लेकिन हो नहीं पा रहा है। दार्शनिक बोले - खुद को तराशो, धैर्य रखो और अपने गुणों को बढ़ाओ, बड़ा परिवर्तन आ जाएगा।
शिष्य बोला- ये तो छोटी-छोटी बातें हैं, इनसे बड़ा परिवर्तन कैसे आ जाएगा? दार्शनिक ने अपनी पेंसिल उठाई और बोले - यह छोटी-सी पेंसिल है, यह भी तुम्हारे जीवन में बड़ा परिवर्तन ला सकती है। शिष्य बोला - कैसे? उन्होंने बोलना शुरू किया - मान लो तुम पेंसिल हो। पेंसिल चले, इसके लिए एक हाथ की जरूरत है। वह हाथ गुरु का भी हो सकता है और ईश्वर का भी। अत: गुरु और ईश्वर में श्रद्धा रखो।undefined

अगर तुमने खुद को तराशा नहीं, तो तुम नहीं चल पाओगे। अपने गुणों को भी तराशो और मेधा को भी..। तराशने में कष्ट होता है, लेकिन उसे सहो। इसके लिए धैर्य पैदा करो। दुख, अपमान और हार को बर्दाश्त करना सीखो। यदि तुमसे कोई गलती हो गई है, तो उस गलती को सुधार लो।

अपने विवेक की रबड़ अपने पास अवश्य रखो। तुम्हारे बाहर की लकड़ी (शरीर) भले ही कमतर हो, लेकिन भीतर जो ग्रेफाइट की छड़ (अंतस) है, उसकी गुणवत्ता अच्छी होनी चाहिए, यानी अपने भीतर के विचारों को शुद्ध करो। क्या तब तुममें बड़ा परिवर्तन नहीं आ जाएगा..? दार्शनिक की बात सुनकर शिष्य चकित था।


कथा-मर्म : छोटी-छोटी चीजें ही जीवन में बड़ा परिवर्तन लाने में मददगार होती हैं।

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