Lovedeep Kapila

Hello World

Shri Krishna's Devotee Temple

Mar 212018

श्री कृष्ण के चमत्कारों से कौन अवगत नहीं हैं| उनकी सभी कथाएं प्रसिद्ध हैं परन्तु सबसे आश्चर्यजनक कथा है पागल बाबा की| घटना यह थी कि एक बहुत गरीब ब्राह्मण कृष्ण जी को बहुत मानता था| पारिवारिक समस्या के कारण उसे धन की आवश्यकता हुई। तो उसने एक साहूकार से कुछ कर्ज़ लिया|

वह थोड़े थोड़े कर के कर्ज़ चूका रहा था लेकिन आखिरी किश्त देने से पहले ही साहूकार की नियत बदल गयी| उसने ब्राह्मण को कोर्ट का नोटिस भेजा जिसमें लिखा था कि उसने कर्ज़ नहीं चुकाया है, इसलिए पूरी धनराशि ब्याज के साथ साहूकार को वापिस की जाए|

ब्राह्मण बहुत घबरा गया। साहूकार के पास जाकर उसने बहुत विनती की मगर कोई असर नहीं हुआ। फिर कोर्ट में भी ब्राह्मण ने यही कहा कि उसने कर्ज़ की आखिरी किश्त के आलावा सारा ऋण चूका दिया है| जज ने उससे अपनी बात साबित करने के लिए कहा तो उत्तर में उसने दुखी होकर कहा कि बिहारी जी के आलावा कौन जानेगा|

अदालत ने कृष्ण मंदिर में नोटिस भेज दिया| वह नोटिस कृष्ण जी की मूर्ति के आगे रख दिया गया और सभी इस बात को भूल गए| अगली तारिख पर एक बूढ़ा आदमी गवाही देने अदालत पहुंचा जिसने जज को बताया कि उसने ब्राह्मण को कर्ज़ वापिस करते हुए देखा है| उस बूढ़े व्यक्ति ने तारिख, वार, रकम की छोटी से छोटी जानकारी अदालत के सामने रखी|

जज ने आगे की जाँच का आदेश दिया| जाँच में साहूकार के बही-खातों में धनराशि दर्ज थी परन्तु गलत नामों से| जज ने ब्राह्मण को निर्दोष करार कर दिया परन्तु जज को संतुष्टि नहीं मिली| जज के मन में कई सवाल उठ रहे थे जैसे- ब्राह्मण को किसी भी चीज़ का ध्यान नहीं था और उस गवाह को सारी बातें कैसे याद थी जबकि वह काफी बूढ़ा था? या ब्राह्मण के लिए किसी भी व्यक्ति ने गवाही नहीं दी उस बूढ़े व्यक्ति ने उसकी मदद क्यों की?

उसने इन सब सवालों का जवाब जानने के लिए ब्राह्मण को बुलवाया और पूछा की वो गवाह कौन था? ब्राह्मण ने कहा कि वह उस व्यक्ति को नहीं जानता पर बिहारी जी के अलावा और कौन हो सकता है| जज ने हँसते हुए कहा मज़ाक छोड़ो और सच बताओ| ब्राह्मण ने गंभीर हो कर कहा की सच में उसे नहीं पता की वो कौन था|undefined

जज संतुष्ट नहीं हुआ और कृष्ण मंदिर जा पहुंचा| वहां सेवा कर रहे लोगों से इस बारे में पूछा तो उनका कहना ये था की जितने भी पत्र आते हैं वो सब कृष्ण जी की मूर्ति पर चढ़ा दिए जाते हैं और जहाँ तक बूढ़े व्यक्ति की बात है तो यहां कोई ऐसा व्यक्ति नहीं है जो गवाही देने गया हो|

जज इस बात को सुन कर बहुत हैरान हो गए| उन्हें पता चल गया था की जो व्यक्ति गवाही देने आया वो कोई और नहीं साक्षात कृष्ण जी थे| इसके बाद उन्होंने अपनी नौकरी और घर-परिवार छोड़कर वृन्दावन में ठाकुर को ढूंढ़ने लगे|

अब जज पागल हो गया, वह भंडारों में जाता और पत्तलों पर से जुठन उठाता। उसमें से आधा जूठ ठाकुर जी की मूर्ति को अर्पित करता आधा खुद खाता। इसे देख कर लोग उसके खिलाफ हो गये और उसे मारते पीटते पर वो ना सुधरा। एक भंडारे में लोगों ने अपनी पत्तलों में कुछ ना छोड़ा ताकि ये पागल ठाकुर जी को जूठ ना खिला सके।undefined

पर उसने फिर भी सभी पत्तलों को पोंछ-पाछकर एक निवाला इकट्ठा किया और अपने मुँह में डाल लिया| जैसे ही उसने निवाला मुँह में डाला उसे ख्याल आया की वो ठाकुर को खिलाना तो भूल ही गया है| उसने वो निवाला अन्दर ना लिया कि अगर पहले मैं खा लूंगा तो ठाकुर का अपमान होगा और थूका तो अन्न का अपमान होगा| तभी एक सुंदर बालक जज के पास आया और बोला क्यों जज साहब आज मेरा भोजन कहाँ हैं?

तब जज ने हाथ जोड़ कर माफ़ी मांगी और रोने लगे| कृष्ण स्वरुप बालक ने जज को कहा कि रोज़ तू मुझे दूसरों का जूठा खिलाता है आज अपना भी खिला दे| इसे सुन जज पागल हो गया और अपने प्राण वहीं त्याग दिए| तो वही जज पागल बाबा के नाम से जाना गया|

महाशिवरात्रि की प्राचीन और पवित्र कथा

Feb 132018

पूर्व काल में चित्रभानु नामक एक शिकारी था। जानवरों की हत्या करके वह अपने परिवार को पालता था। वह एक साहूकार का कर्जदार था, लेकिन उसका ऋण समय पर न चुका सका। क्रोधित साहूकार ने शिकारी को शिवमठ में बंदी बना लिया। संयोग से उस दिन शिवरात्रि थी। शिकारी ध्यानमग्न होकर शिव-संबंधी धार्मिक बातें सुनता रहा। चतुर्दशी को उसने शिवरात्रि व्रत की कथा भी सुनी। शाम होते ही साहूकार ने उसे अपने पास बुलाया और ऋण चुकाने के विषय में बात की। शिकारी अगले दिन सारा ऋण लौटा देने का वचन देकर बंधन से छूट गया। अपनी दिनचर्या की भांति वह जंगल में शिकार के लिए निकला। लेकिन दिनभर बंदी गृह में रहने के कारण भूख-प्यास से व्याकुल था। शिकार खोजता हुआ वह बहुत दूर निकल गया। जब अंधकार हो गया तो उसने विचार किया कि रात जंगल में ही बितानी पड़ेगी। वह वन एक तालाब के किनारे एक बेल के पेड़ पर चढ़ कर रात बीतने का इंतजार करने लगा।बिल्व वृक्ष के नीचे शिवलिंग था जो बिल्वपत्रों से ढंका हुआ था। शिकारी को उसका पता न चला। पड़ाव बनाते समय उसने जो टहनियां तोड़ीं, वे संयोग से शिवलिंग पर गिरती चली गई। इस प्रकार दिनभर भूखे-प्यासे शिकारी का व्रत भी हो गया और शिवलिंग पर बिल्वपत्र भी चढ़ गए। एक पहर रात्रि बीत जाने पर एक गर्भिणी हिरणी तालाब पर पानी पीने पहुंची। शिकारी ने धनुष पर तीर चढ़ाकर ज्यों ही प्रत्यंचा खींची, हिरणी बोली, 'मैं गर्भिणी हूँ। शीघ्र ही प्रसव करूंगी। तुम एक साथ दो जीवों की हत्या करोगे, जो ठीक नहीं है। मैं बच्चे को जन्म देकर शीघ्र ही तुम्हारे समक्ष प्रस्तुत हो जाऊंगी, तब मार लेना।' शिकारी ने धनुष पर तीर चढ़ाकर ज्यों ही प्रत्यंचा खींची, हिरणी बोली, 'मैं गर्भिणी हूँ। शीघ्र ही प्रसव करूंगी। तुम एक साथ दो जीवों की हत्या करोगे, जो ठीक नहीं है। मैं बच्चे को जन्म देकर शीघ्र ही तुम्हारे समक्ष प्रस्तुत हो जाऊंगी, तब मार लेना।' कुछ ही देर बाद एक और हिरणी उधर से निकली। शिकारी की प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। समीप आने पर उसने धनुष पर बाण चढ़ाया। तब उसे देख हिरणी ने विनम्रतापूर्वक निवेदन किया, 'हे शिकारी! मैं थोड़ी देर पहले ऋतु से निवृत्त हुई हूं। कामातुर विरहिणी हूं। अपने प्रिय की खोज में भटक रही हूं। मैं अपने पति से मिलकर शीघ्र ही तुम्हारे पास आ जाऊंगी।'

शिकारी ने उसे भी जाने दिया। दो बार शिकार को खोकर उसका माथा ठनका। वह चिंता में पड़ गया। रात्रि का आखिरी पहर बीत रहा था। इस बार भी धनुष से लग कर कुछ बेलपत्र शिवलिंग पर जा गिरे तथा दूसरे प्रहर की पूजन भी सम्पन्न हो गई।undefined

तभी एक अन्य हिरणी अपने बच्चों के साथ उधर से निकली। शिकारी के लिए यह स्वर्णिम अवसर था। उसने धनुष पर तीर चढ़ाने में देर नहीं लगाई। वह तीर छोड़ने ही वाला था कि हिरणी बोली, 'हे शिकारी!' मैं इन बच्चों को इनके पिता के हवाले करके लौट आऊंगी। इस समय मुझे मत मारो।

शिकारी हंसा और बोला, सामने आए शिकार को छोड़ दूं, मैं ऐसा मूर्ख नहीं। इससे पहले मैं दो बार अपना शिकार खो चुका हूं। मेरे बच्चे भूख-प्यास से व्यग्र हो रहे होंगे। उत्तर में हिरणी ने फिर कहा, जैसे तुम्हें अपने बच्चों की ममता सता रही है, ठीक वैसे ही मुझे भी। हे शिकारी! मेरा विश्वास करों, मैं इन्हें इनके पिता के पास छोड़कर तुरंत लौटने की प्रतिज्ञा करती हूँ। हिरणी का दीन स्वर सुनकर शिकारी को उस पर दया आ गई। उसने उस मृगी को भी जाने दिया। शिकार के अभाव में तथा भूख-प्यास से व्याकुल शिकारी अनजाने में ही बेल-वृक्ष पर बैठा बेलपत्र तोड़-तोड़कर नीचे फेंकता जा रहा था। पौ फटने को हुई तो एक हृष्ट-पुष्ट मृग उसी रास्ते पर आया। शिकारी ने सोच लिया कि इसका शिकार वह अवश्य करेगा।

शिकारी की तनी प्रत्यंचा देखकर मृग विनीत स्वर में बोला, हे शिकारी! यदि तुमने मुझसे पूर्व आने वाली तीन मृगियों तथा छोटे-छोटे बच्चों को मार डाला है, तो मुझे भी मारने में विलंब न करो, ताकि मुझे उनके वियोग में एक क्षण भी दुख न सहना पड़े। मैं उन हिरणियों का पति हूं। यदि तुमने उन्हें जीवनदान दिया है तो मुझे भी कुछ क्षण का जीवन देने की कृपा करो। मैं उनसे मिलकर तुम्हारे समक्ष उपस्थित हो जाऊंगा।undefined

मृग की बात सुनते ही शिकारी के सामने पूरी रात का घटनाचक्र घूम गया, उसने सारी कथा मृग को सुना दी। तब मृग ने कहा, 'मेरी तीनों पत्नियां जिस प्रकार प्रतिज्ञाबद्ध होकर गई हैं, मेरी मृत्यु से अपने धर्म का पालन नहीं कर पाएंगी। अतः जैसे तुमने उन्हें विश्वासपात्र मानकर छोड़ा है, वैसे ही मुझे भी जाने दो। मैं उन सबके साथ तुम्हारे सामने शीघ्र ही उपस्थित होता हूँ।'

शिकारी ने उसे भी जाने दिया। इस प्रकार प्रात: हो आई। उपवास, रात्रि-जागरण तथा शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ने से अनजाने में ही पर शिवरात्रि की पूजा पूर्ण हो गई। पर अनजाने में ही की हुई पूजन का परिणाम उसे तत्काल मिला। शिकारी का हिंसक हृदय निर्मल हो गया। उसमें भगवद्शक्ति का वास हो गया। थोड़ी ही देर बाद वह मृग सपरिवार शिकारी के समक्ष उपस्थित हो गया, ताकि वह उनका शिकार कर सके।, किंतु जंगली पशुओं की ऐसी सत्यता, सात्विकता एवं सामूहिक प्रेमभावना देखकर शिकारी को बड़ी ग्लानि हुई। उसने मृग परिवार को जीवनदान दे दिया।

अनजाने में शिवरात्रि के व्रत का पालन करने पर भी शिकारी को मोक्ष की प्राप्ति हुई। जब मृत्यु काल में यमदूत उसके जीव को ले जाने आए तो शिवगणों ने उन्हें वापस भेज दिया तथा शिकारी को शिवलोक ले गए। शिव जी की कृपा से ही अपने इस जन्म में राजा चित्रभानु अपने पिछले जन्म को याद रख पाए तथा महाशिवरात्रि के महत्व को जान कर उसका अगले जन्म में भी पालन कर पाए। शिकारी की कथानुसार महादेव तो अनजाने में किए गए व्रत का भी फल दे देते हैं। पर वास्तव में महादेव शिकारी की दया भाव से प्रसन्न हुए। अपने परिवार के कष्ट का ध्यान होते हुए भी शिकारी ने मृग परिवार को जाने दिया। यह करुणा ही वस्तुत: उस शिकारी को उन पण्डित एवं पूजारियों से उत्कृष्ट बना देती है जो कि सिर्फ रात्रि जागरण, उपवास एव दूध, दही, एवं बेल-पत्र आदि द्वारा शिव को प्रसन्न कर लेना चाहते हैं।undefined

इस कथा में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस कथा में 'अनजाने में हुए पूजन' पर विशेष बल दिया गया है। इसका अर्थ यह नहीं है कि शिव किसी भी प्रकार से किए गए पूजन को स्वीकार कर लेते हैं अथवा भोलेनाथ जाने या अनजाने में हुए पूजन में भेद नहीं कर सकते हैं।

वास्तव में वह शिकारी शिव पूजन नहीं कर रहा था। इसका अर्थ यह भी हुआ कि वह किसी तरह के किसी फल की कामना भी नहीं कर रहा था। उसने मृग परिवार को समय एवं जीवन दान दिया जो कि शिव पूजन के समान है। शिव का अर्थ ही कल्याण होता है। उन निरीह प्राणियों का कल्याण करने के कारण ही वह शिव तत्व को जान पाया तथा उसका शिव से साक्षात्कार हुआ। परोपकार करने के लिए महाशिवरात्रि का दिवस होना भी आवश्यक नहीं है। पुराण में चार प्रकार के शिवरात्रि पूजन का वर्णन है। मासिक शिवरात्रि, प्रथम आदि शिवरात्रि, तथा महाशिवरात्रि। पुराण वर्णित अंतिम शिवरात्रि है-नित्य शिवरात्रि। वस्तुत: प्रत्येक रात्रि ही 'शिवरात्रि' है अगर हम उन परम कल्याणकारी आशुतोष भगवान में स्वयं को लीन कर दें तथा कल्याण मार्ग का अनुसरण करें, वही शिवरात्रि का सच्चा व्रत है।

Means of Donation दान का मतलब

Jan 272018

दान में महत्व है त्याग का, वस्तु के मूल्य या संख्या का नहीं | ऐसी त्याग बुद्धि से जो सुपात्र को यानि जिस वस्तु का जिसके पास अभाव है, उसे वह वस्तु देना और उसमें किसी भी प्रकार की कामना न रखना, उत्तम दान है | निष्काम भाव से किसी भूखे को भोजन और प्यासे को जल देना सात्विक दान है |undefined

संत एकनाथ जी की कथा आती है | की वह एक समय प्रयाग से कांवर पर जल लेकर श्रीरामेश्ह्वर चढ़ाने के लिए जा रहे थे | रास्ते में जब एक जगह उन्होंने देखा कि एक गधा प्यास के कारण पानी के बिना तड़प रहा है, तो उसे देखकर उन्हें दया आ गयी और उन्होनें उसे थोडा-सा जल पिलाया, इससे उसे कुछ चेत-सा आया | फिर उन्होनें थोडा-थोडा करके सारा जल उसे पिला दिया | वह गधा उठकर चला गया | साथियों ने सोचा कि त्रिवेणी का जल व्यर्थ हो गया और यात्रा भी निष्फल हो गयी |
तब एकनाथ जी ने हंसकर कहा, " भाइयों, बार बार सुनते हो कि भगबान सब प्राणियों के अंदर हैं, फिर भी ऐसे बावलेपन कि बातें सोचते हो | मेरी पूजा तो यहीं से श्रीरामेश्वर को पहुँच गई | भगवान शंकर ने मेरे जल को स्वीकार कर लिया |

Get rid of cycles of Life and Death जीवन मृत्यु के चक्र से छुटकारा

Jan 172018

शास्त्रों के अनुसार जन्म और मृत्यु एक चक्र है तो अनवरत चलता रहता है। आत्मा वस्त्रों की तरह शरीर बदलती रहती है। आत्मा अमर है और वह निश्चित समय के लिए अलग-अलग शरीर धारण करती है। प्राणी के जीवन और मृत्यु के इस चक्र से मुक्ति को मोक्ष कहा जाता है।

आचार्य चाणक्य ने 5 बातें बताई हैं, जो इंसान जीवन में इन बातों का ध्यान रखता है उसे मोक्ष प्राप्त हो जाता है-undefined


आचार्य चाणक्य कहते हैं कि :-- "वचनशुद्धि मनशुद्धि औ, इन्द्रिय संयम शुद्धि। भूत दया औ स्वच्छता, पर अर्थिन यह बुद्धि।।"


आचार्य चाणक्य ने इस दौहे में बताया है कि जो लोग अपनी वाणी में पवित्रता बनाए रखते हैं, कभी भी किसी के मन को ठेस नहीं पहुंचाते हैं, हमेशा मीठा बोलते हैं, उन्हें मोक्ष प्राप्त होता है।

जो लोग मन से शुद्ध होते हैं, किसी का अहित नहीं सोचते हैं उन्हें मोक्ष प्राप्त होता है।

जो लोग इंद्रियों पर संयम रखते हैं और व्यर्थ की बातों में ध्यान नहीं देते हैं उन्हें बार-बार जन्म-मृत्यु के चक्र में फंसना नहीं पड़ता है।

सभी जीवों और प्राणियों से प्रेम करना, सभी का ध्यान रखना, किसी को नुकसान नहीं पहुंचाना ये गुण वाले व्यक्ति को मोक्ष प्राप्त होता है।

जो लोग अपने धन की दूसरों की मदद में खर्च करते हैं, जो धन को व्यर्थ खर्च नहीं करते हैं, जो लोग धर्म के कार्यों में धन लगाते हैं उन्हें मोक्ष प्राप्त होता है।

Instant Preyer

Jan 152018

 

Instant Preyer

आजकल भागदौड़ भरी ज़िंदगी है। हरेक इंसान के पास अपनों के लिए तो रहने दो उसके खुद के लिए समय नहीं है। ज्यादातर इंसान अलादीन के चिराग के तरह इच्छा पूर्ति के साथ जीना पसंद करते हैं। और चाहते है की जब उन्होंने मांग की तो तुंरत उनकी इच्छा पूरी हो जाये। लेकिन वो खुद कोई काम नहीं करना चाहते।
जबकि उनके मां-बाप उनसे वही उम्मीद करते हैं की जो सेवा उन्होंने अपने माँ -बाप की की थी या उनके माँ -बाप ने उनके दादा -दादी की की थी। उनके बच्चे भी वैसा ही करें। रिश्तो की एहमियत समझे। सुबह जल्दी उठे नहा-धोकर भगवान् का नाम ले। बड़ो का आदर करें। और जब उनकी औलाद ऐसा नहीं करती तो कहीं न कहीं उनके मन को ठेस लगती हैं। आपसी मन मुटाव बढ़ता हैं। ()

आज की नई पीढ़ी कम समय में ज्यादा सोच विचार करती है। रिश्तों में एक जैसा (जैसे को तैसा ) व्यवहार चाहती है। अच्छे के साथ अच्छा और बुरे के साथ बुरा या फिर किनारा कर लेते हैं। जिस काम में समय ज्यादा लगाना पड़े उसको टाल देती है। ज्यादा सब्र नहीं रख पाती। जिसके कारण भगवान को भी ज्यादा समय नहीं देते। उन्हें लगता है की सारा काम उन्हें ही करना पड़ेगा। भगवान के किये कुछ नहीं होगा। लेकिन जब ज़िंदगी में मुश्किलें आती हैं तो यही नई पीढ़ी भगवान् से मांगने पहुँच जाती है। लेकिन सही दंग से भगवान् से कैसे मांगे इसकी जानकारी नहीं होती। हमारे मंत्र भी काफी कठिन और लम्बे होते है। जिसका सही उच्चारण न कर पाने के कारण और समय न होने के कारण नई पीढ़ी पाठ नहीं कर पाती। 
सबसे पहले बात करते है रामायण जी की। हमारे ग्रंथो में एक श्लोकी रामायण का वर्णन दिया हुआ है। जिसके उच्चारण में बहुत काम समय लगता है। लेकिन जिसका फल सारी रामायण पढ़ने के बराबर मिलता है। :--

 

आदौ रामतपोवनादिगमनं हत्वा मृगं काञ्चनं

वैदेहीहरणं जटायुमरणं सुग्रीवसम्भाषणम्।

बालीनिग्रहणं समुद्रतरणं लंकापुरी दाहनं

पश्चाद्रावण कुम्भकर्ण हनन मेतद्धि रामायणम्।।

एक श्लोकी भागवत :--

आदौ देवकी देव गर्भजननं, गोपी गृहे वद्र्धनम्।
माया पूज निकासु ताप हरणं गौवद्र्धनोधरणम्।।
कंसच्छेदनं कौरवादिहननं, कुंतीसुपाजालनम्।
एतद् श्रीमद्भागवतम् पुराण कथितं श्रीकृष्ण लीलामृतम्।।
अच्युतं केशवं रामनारायणं कृष्ण:दामोदरं वासुदेवं हरे।
श्रीधरं माधवं गोपिकावल्लभं जानकी नायकं रामचन्द्रं भजे।।

एक श्लोकी दुर्गासप्तशती :--

या अंबा मधुकैटभ प्रमथिनी,या माहिषोन्मूलिनी,
या धूम्रेक्षण चन्ड मुंड मथिनी,या रक्तबीजाशिनी,
शक्तिः शुंभ निशुंभ दैत्य दलिनी,या सिद्धलक्ष्मी: परा,
सादुर्गा नवकोटि विश्व सहिता,माम् पातु विश्वेश्वरी

Lohri

Jan 132018

लोहड़ी पौष के अंतिम दिन, सूर्यास्त के बाद (माघ संक्रांति से पहली रात) यह पर्व मनाया जाता है। यह मुख्यत: पंजाब का पर्व है।आधुनिक युग में अब यह लोहड़ी का त्यौहार सिर्फ पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, जम्मू काश्मीर और हिमांचल में ही नहीं अपितु बंगाल तथा उड़िया लोगो द्वारा भी मनाया जा रहा हैं ! यह प्राय: १२ या १३ जनवरी को पड़ता है। यह द्योतार्थक (एक्रॉस्टिक) शब्द लोहड़ी की पूजा के समय व्यवहृत होने वाली वस्तुओं के द्योतक वर्णों का समुच्चय जान पड़ता है, जिसमें ल (लकड़ी) +ओह (गोहा = सूखे उपले) +ड़ी (रेवड़ी) = 'लोहड़ी' के प्रतीक हैं। श्वतुर्यज्ञ का अनुष्ठान मकर संक्रांति पर होता था, संभवत: लोहड़ी उसी का अवशेष है। पूस-माघ की कड़कड़ाती सर्दी से बचने के लिए आग भी सहायक सिद्ध होती है। यही व्यावहारिक आवश्यकता 'लोहड़ी' को मौसमी पर्व का स्थान देती है।

लोहड़ी से संबद्ध परंपराओं एवं रीति-रिवाजों से ज्ञात होता है कि प्रागैतिहासिक गाथाएँ भी इससे जुड़ गई हैं। दक्ष प्रजापति की पुत्री सती के योगाग्नि-दहन की याद में ही यह अग्नि जलाई जाती है। इस अवसर पर विवाहिता पुत्रियों को माँ के घर से 'त्योहार' (वस्त्र, मिठाई, रेवड़ी, फलादि) भेजा जाता है। यज्ञ के समय अपने जामाता शिव का भाग न निकालने का दक्ष प्रजापति का प्रायश्चित्त ही इसमें दिखाई पड़ता है। उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में 'खिचड़वार' तथा दक्षिण भारत के 'पोंगल' पर भी जो 'लोहड़ी' के समीप ही मनाए जाते हैं। बेटियों को भेंट की जाती है।

लोहड़ी को दुल्ला भट्टी की एक कहानी से भी जोड़ा जाता हैं। लोहड़ी की सभी गानों को दुल्ला भट्टी से ही जुड़ा तथा यह भी कह सकते हैं कि लोहड़ी के गानों का केंद्र बिंदु दुल्ला भट्टी को ही बनाया जाता हैं।undefined

दुल्ला भट्टी मुग़ल शासक अकबर के समय में पंजाब में रहता था। उसे पंजाब के नायक की उपाधि से सम्मानित किया गया था! उस समय संदल बार के जगह पर लड़कियों को गुलामी के लिए बल पूर्वक अमीर लोगों को बेच जाता था जिसे दुल्ला भट्टी ने एक योजना के तहत लड़कियों को न की मुक्त ही करवाया बल्कि उनकी शादी की हिन्दू लडको से करवाई और उनके शादी के सभी व्यवस्था भी करवाई।दुल्ला भट्टी एक विद्रोही था और जिसकी वंशवली भट्टी राजपूत थे। उसके पूर्वज पिंडी भट्टियों के शासक थे जो की संदल बार में था अब संदल बार पकिस्तान में स्थित हैं। वह सभी पंजाबियों का नायक था।

लोहड़ी से २०-२५ दिन पहले ही बालक एवं बालिकाएँ 'लोहड़ी' के लोकगीत गाकर लकड़ी और उपले इकट्ठे करते हैं। संचित सामग्री से चौराहे या मुहल्ले के किसी खुले स्थान पर आग जलाई जाती है। मुहल्ले या गाँव भर के लोग अग्नि के चारों ओर आसन जमा लेते हैं। घर और व्यवसाय के कामकाज से निपटकर प्रत्येक परिवार अग्नि की परिक्रमा करता है। जिन परिवारों में लड़के का विवाह होता है अथवा जिन्हें पुत्र प्राप्ति होती है, उनसे पैसे लेकर मुहल्ले या गाँव भर में बच्चे ही बराबर बराबर रेवड़ी बाँटते हैं। और ये ही चीजें प्रसाद के रूप में सभी उपस्थित लोगों को बाँटी जाती हैं। कई जगह घर लौटते समय 'लोहड़ी' में से दो चार दहकते कोयले, प्रसाद के रूप में, घर पर लाने की प्रथा भी है। लोहड़ी के दिन या उससे दो चार दिन पूर्व बालक बालिकाएँ बाजारों में दुकानदारों तथा पथिकों से 'मोहमाया' या महामाई (लोहड़ी का ही दूसरा नाम) के पैसे माँगते हैं, इनसे लकड़ी एवं रेवड़ी खरीदकर सामूहिक लोहड़ी में प्रयुक्त करते हैं।

How to save a relationship रिश्ते को कैसे बचाएंगे

Jan 082018

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एक सहेली ने दूसरी सहेली से पूछा:- बच्चा पैदा होने की खुशी में तुम्हारे पति ने तुम्हें क्या तोहफा दिया ?
सहेली ने कहा - कुछ भी नहीं!
उसने सवाल करते हुए पूछा कि क्या ये अच्छी बात है ? क्या उस की नज़र में तुम्हारी कोई कीमत नहीं ?
लफ्ज़ों का ये ज़हरीला बम गिरा कर वह सहेली दूसरी सहेली को अपनी फिक्र में छोड़कर चलती बनी।।
थोड़ी देर बाद शाम के वक्त उसका पति घर आया और पत्नी का मुंह लटका हुआ पाया।। फिर दोनों में झगड़ा हुआ।।
एक दूसरे को लानतें भेजी।। मारपीट हुई, और आखिर पति पत्नी में तलाक हो गया।।

जानते हैं प्रॉब्लम की शुरुआत कहां से हुई ? उस फिजूल जुमले से जो उसका हालचाल जानने आई सहेली ने कहा था।।

रवि ने अपने जिगरी दोस्त पवन से पूछा:- तुम कहां काम करते हो?
पवन- फला दुकान में।। रवि- कितनी तनख्वाह देता है मालिक?
पवन-18 हजार।।
रवि-18000 रुपये बस, तुम्हारी जिंदगी कैसे कटती है इतने पैसों में ? undefined
पवन- (गहरी सांस खींचते हुए)- बस यार क्या बताऊं।।
मीटिंग खत्म हुई, कुछ दिनों के बाद पवन अब अपने काम से बेरूखा हो गया।। और तनख्वाह बढ़ाने की डिमांड कर दी।। जिसे मालिक ने रद्द कर दिया।। पवन ने जॉब छोड़ दी और बेरोजगार हो गया।। पहले उसके पास काम था अब काम नहीं रहा।।

एक साहब ने एक शख्स से कहा जो अपने बेटे से अलग रहता था।। तुम्हारा बेटा तुमसे बहुत कम मिलने आता है।। क्या उसे तुमसे मोहब्बत नहीं रही? बाप ने कहा बेटा ज्यादा व्यस्त रहता है, उसका काम का शेड्यूल बहुत सख्त है।। उसके बीवी बच्चे हैं, उसे बहुत कम वक्त मिलता है।।
पहला आदमी बोला- वाह!! यह क्या बात हुई, तुमने उसे पाला-पोसा उसकी हर ख्वाहिश पूरी की, अब उसको बुढ़ापे में व्यस्तता की वजह से मिलने का वक्त नहीं मिलता है।। तो यह ना मिलने का बहाना है।।
इस बातचीत के बाद बाप के दिल में बेटे के प्रति शंका पैदा हो गई।। बेटा जब भी मिलने आता वो ये ही सोचता रहता कि उसके पास सबके लिए वक्त है सिवाय मेरे।।

याद रखिए जुबान से निकले शब्द दूसरे पर बड़ा गहरा असर डाल देते हैं।। बेशक कुछ लोगों की जुबानों से शैतानी बोल निकलते हैं।। हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में बहुत से सवाल हमें बहुत मासूम लगते हैं।। जैसे-
तुमने यह क्यों नहीं खरीदा।।
तुम्हारे पास यह क्यों नहीं है।।
तुम इस शख्स के साथ पूरी जिंदगी कैसे चल सकती हो।।
तुम उसे कैसे मान सकते हो।। वगैरा वगैरा।।

इस तरह के बेमतलबी फिजूल के सवाल नादानी में या बिना मकसद के हम पूछ बैठते हैं।।
जबकि हम यह भूल जाते हैं कि हमारे ये सवाल सुनने वाले के दिल में नफरत या मोहब्बत का कौन सा बीज बो रहे हैं।।

आज के दौर में हमारे इर्द-गिर्द, समाज या घरों में जो टेंशन टाइट होती जा रही है, उनकी जड़ तक जाया जाए तो अक्सर उसके पीछे किसी और का हाथ होता है।। वो ये नहीं जानते कि नादानी में या जानबूझकर बोले जाने वाले जुमले किसी की ज़िंदगी को तबाह कर सकते हैं।।
ऐसी हवा फैलाने वाले हम ना बनें।। लोगों के घरों में अंधे बनकर जाओ और वहां से गूंगे बनकर निकलो।

एक बार विचार जरूर करो
किसी के कहने पर जिऩ्दगी को ख़राब होने से बचाए ।

God’s Perfect Plan

Jan 042018

एक बार भगवान से उनका सेवक कहता है,
भगवान, "आप एक जगह खड़े-खड़े थक गये होंगे, एक दिन के लिए मैं आपकी जगह मूर्ति बनकर खड़ा हो जाता हूं l आप मेरा रूप धारण कर घूम आओ l
भगवान मान जाते हैं, लेकिन शर्त रखते हैं कि, जो भी लोग प्रार्थना करने आयें, तुम बस उनकी प्रार्थना सुन लेना कुछ बोलना नहीं l मैंने उन सभी के लिए प्लानिंग कर रखी है l
सेवक मान जाता है l

सबसे पहले मंदिर में Businessman आता है और कहता है, "भगवान मैंने एक नयी फैक्ट्री डाली है l उसे खूब सफल करना" l वह माथा टेकता है, तो उसका पर्स नीचे
गिर जाता है l वह बिना पर्स लिये ही चला जाता है l सेवक बेचैन हो जाता है. वह सोचता है, कि रोककर उसे बताये कि पर्स गिर गया, लेकिन शर्त की वजह से वह नहीं कह पाता l

इसके बाद एक गरीब आदमी आता है और भगवान को कहता है कि घर में खाने को कुछ नहीं l भगवान मदद करो l तभी उसकी नजर पर्स पर पड़ती है l वह भगवान का शुक्रिया
अदा करता है और पर्स लेकर चला जाता है l

अब तीसरा व्यक्ति आता है, वह नाविक होता है l वह भगवान से कहता है कि, "मैं 15 दिनों के लिए जहाज लेकर समुद्र की यात्रा पर जा रहा हूं l यात्रा में कोई अड़चन न आये भगवान..

तभी पीछे से Businessman पुलिस के साथ आता है और कहता है कि मेरे बाद ये नाविक आया है l इसी ने मेरा पर्स चुरा लिया है, पुलिस नाविक को ले जा रही होती है,
तभी सेवक बोल पड़ता है lundefined

अब पुलिस सेवक के कहने पर उस गरीब आदमी को पकड़ कर जेल में बंद कर देती है l Businessman रात को भगवान आते हैं, तो सेवक खुशी खुशी पूरा किस्सा बताता है l

भगवान कहते हैं, तुमने किसी का काम बनाया नहीं, बल्कि बिगाड़ा है l

वह व्यापारी गलत धंधे करता है,अगर उसका पर्स गिर भी गया, तो उसे फर्क नहीं पड़ता था l इससे उसके पाप ही कम होते, क्योंकि वह पर्स गरीब इंसान को मिला था l पर्स
मिलने पर उसके बच्चे भूखों नहीं मरते l रही बात नाविक की, तो वह जिस यात्रा पर जा रहा था, वहां तूफान आनेवाला था l अगर वह जेल में रहता, तो जान बच जाती l उसकी
पत्नी विधवा होने से बच जाती l तुमने सब गड़बड़ कर दी l

कई बार हमारी लाइफ में भी ऐसी Problems आती है, जब हमें लगता है कि ये मेरे साथ ही क्यों हुआ l लेकिन इसके पीछे भगवान की Planing होती है l जब भी कोई

प्रॉब्लमन आये l उदास मत होना l इस कहानी को याद करना और सोचना कि जो भी होता है,i अच्छे के लिए होता है ll 

आधुनिक डॉक्टर

Jan 032018

एक फेमस हॉस्पिटल में डॉक्टरों की टीम ने पेशंट को तुरंत बायपास सर्जरी करवाने की सलाह दी। पेशंट नर्वस हो गया किंतु तुरंत तयारी में लग गया।
ऐसे वक्त थोडा संयम रखकर सेकंड ओपीनियन लेना ज्यादा ठीक होता।
ऑपरेशन के पहले वाले सारे टेस्ट हो जाने के बाद डॉक्टर की टीम ने बजट बताया, जो की पेशंट को बहुत ज्यादा लगा।
लेकीन जान है तो जहान है यह सोचकर वह फॉर्म भरने लगा...
व्यवसाय के कॉलम के आगे उसने C.B.I. लिख दिया।
अचानक हॉस्पिटल का वातावरण ही बदल गया। डॉक्टरों की दुसरी टीम चेकअप करने आयी। रीचेकींग हुआ और टीम ने घोषित किया की ऑपरेशन की जरूरत नहीं है। मेडिसिन खाते रहिये ब्लाकेज निकल जायेगा।
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पेशंट Central Bank of India का एम्प्लॉई था।

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